Tuesday, 12 May 2020

"त्वमेव माता च पिता त्वमेव"

सामान्य से श्लोक का गूढ़तम भावार्थ

"त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।।"

सरल-सा अर्थ है, 
'हे भगवान! 
तुम्हीं माता हो, 
तुम्हीं पिता, 
तुम्हीं बंधु, 
तुम्हीं सखा हो। 
तुम्हीं विद्या हो, 
तुम्हीं द्रव्य, 
तुम्हीं सब कुछ हो।
मेरे देवता हो।'

बचपन से प्रायः सबने पढ़ी है। छोटी और सरल है इसलिए रटा दी गई है। 
बस त्वमेव माता भर बोल दो, सामने वाला तोते की तरह पूरा श्लोक सुना देता है।

मैंने 'अपने रटे हुए' कम से कम 50 मित्रों से पूछा होगा, 
'द्रविणं' का क्या अर्थ है? 
संयोग देखिए एक भी न बता पाया। अच्छे खासे पढ़े-लिखे भी। एक ही शब्द 'द्रविणं' पर  सोच में पड़ गए।

द्रविणं पर चकराते हैं और अर्थ जानकर चौंक पड़ते हैं। 
द्रविणं जिसका अर्थ है द्रव्य, धन-संपत्ति। द्रव्य जो तरल है, निरंतर प्रवाहमान। यानी वह जो कभी स्थिर नहीं रहता।

कितनी सुंदर प्रार्थना है और उतना ही प्रेरक उसका 'वरीयता क्रम'। ज़रा देखिए तो ! समझिए तो !

सबसे पहले माता क्योंकि वह है तो फिर संसार में किसी की जरूरत ही नहीं। इसलिए हे प्रभु! तुम माता हो!

फिर पिता, अतः हे ईश्वर! तुम पिता हो ! दोनों नहीं हैं तो फिर भाई ही काम आएंगे। इसलिए तीसरे क्रम पर भगवान से भाई का रिश्ता जोड़ा है।

जिसकी न माता रही, न पिता, न भाई तब सखा काम आ सकते हैं, अतः सखा त्वमेवं !

वे भी नहीं तो आपकी विद्या ही काम आना है। यदि जीवन के संघर्ष में नियति ने आपको निपट अकेला छोड़ दिया है तब आपका ज्ञान ही आपका भगवान बन सकेगा। यही इसका संकेत है।

और सबसे अंत में 'द्रविणं' अर्थात धन। जब कोई पास न हो तब हे देवता तुम्हीं धन हो।

रह-रहकर सोचता हूं कि प्रार्थनाकार ने वरीयता क्रम में जो धन-द्रविणं सबसे पीछे है, हमारे आचरण में सबसे ऊपर क्यों आ जाता है? इतना कि उसे ऊपर लाने के लिए माता से पिता तक, बंधु से सखा तक सब नीचे चले जाते हैं, पीछे छूट जाते हैं।

वह कीमती है, पर उससे ज्यादा कीमती और भी हैं, उससे बहुत ऊँचे आपके अपने।

अनगिनत प्यारी से प्यारी प्रार्थनाओं में न जाने क्यों अनजाने ही एक अद्भुत वरीयता क्रम दर्शाती यह प्रार्थना मुझे जीवन के सूत्र और रिश्तों के मर्म सिखाती रहती है। 

बार-बार ख्याल आता है, द्रविणं सबसे पीछे बाकी रिश्ते ऊपर। बाकी लगातार ऊपर से ऊपर, धन क्रमश: नीचे से नीचे !

इस अनूठी प्रार्थना का यह पारिवारिक पक्ष' और 'द्रविणं' की औकात पर मित्रों से सत्संग होता है, एक बात कहना नहीं भूलता !

याद रखिये दुनिया में झगड़ा रोटी का नहीं थाली का है ! वरना वह रोटी तो सबको देता ही है !

चांदी की थाली यदि कभी आपके वरीयता क्रम को पलटने लगे, तो इस प्रार्थना को जरूर याद कर लीजिये।
 
हमेशा ख्याल रहे कि क्रम माता च पिता, बंधु _च सखा है.....

🙏 जय श्रीकृष्ण जय श्रीराम। 🙏


(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Monday, 11 May 2020

देव मूर्ति की परिक्रमा ।

🥀⚘जय श्री राधे ⚘🥀
किस देवता की, कितनी परिक्रमा करे ?

जब हम मंदिर जाते है तो हम भगवान की परिक्रमा जरुर लगाते है. पर क्या कभी हमने ये सोचा है कि देव मूर्ति की परिक्रमा क्यो की जाती है ? 

शास्त्रों में लिखा है जिस स्थान पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई हो, उसके मध्य बिंदु से लेकर कुछ दूरी तक दिव्य प्रभा अथवा प्रभाव रहता है,यह निकट होने पर अधिक गहरा और दूर दूर होने पर घटता जाता है, इसलिए प्रतिमा के निकट परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल से निकलने वाले तेज की सहज ही प्राप्ती हो जाती है.
मंदिर में दैवीय शक्तियों का प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर होता है। बाईं तरफ से परिक्रमा करने पर सकारात्मक ऊर्जा का हमारे अंदर विद्यामान ऊर्जा से टकराव होने पर हमारा तेज कम हो जाता है। परिक्रमा करते समय बीच-बीच में रुकना नहीं चाहिए अौर न ही किसी से बात करनी चाहिए। परिक्रमा नंगे पाव की जाती है। 

कैसे करे परिक्रमा
देवमूर्ति की परिक्रमा सदैव दाएं हाथ की ओर से करनी चाहिए क्योकि दैवीय शक्ति की आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है।बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्य परमाणुओं में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है.जाने-अनजाने की गई उल्टी परिक्रमा का दुष्परिणाम भुगतना पडता है.

किस देव की कितनी परिक्रमा करनी चाहिये ?
वैसे तो सामान्यत: सभी देवी-देवताओं की एक ही परिक्रमा की जाती है परंतु शास्त्रों के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की अलग संख्या निर्धारित की गई है। इस संबंध में धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान की परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और इससे हमारे पाप नष्ट होते है.सभी देवताओं की परिक्रमा के संबंध में अलग-अलग नियम बताए गए हैं.

1. - महिलाओं द्वारा "वटवृक्ष" की परिक्रमा करना सौभाग्य का सूचक है.

2. - "शिवजी" की आधी परिक्रमा की जाती है.है शिव जी की परिक्रमा करने से बुरे खयालात और अनर्गल स्वप्नों का खात्मा होता है।भगवान शिव की परिक्रमा करते समय अभिषेक की धार को न लांघे.

3. - "देवी मां" की एक परिक्रमा की जानी चाहिए.

4. - "श्रीगणेशजी और हनुमानजी" की तीन परिक्रमा करने का विधान है.गणेश जी की परिक्रमा करने से अपनी सोची हुई कई अतृप्त कामनाओं की तृप्ति होती है.गणेशजी के विराट स्वरूप व मंत्र का विधिवत ध्यान करने पर कार्य सिद्ध होने लगते हैं.

5. श्री कृष्ण की चार परिक्रमा करने से पुण्य प्राप्त होता हैै। भगवान विष्णुजी" एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए.विष्णु जी की परिक्रमा करने से हृदय परिपुष्ट और संकल्प ऊर्जावान बनकर सकारात्मक सोच की वृद्धि करते हैं.

6. - सूर्य मंदिर की सात परिक्रमा करने से मन पवित्र और आनंद से भर उठता है तथा बुरे और कड़वे विचारों का विनाश होकर श्रेष्ठ विचार पोषित होते हैं. हमें भास्कराय मंत्र का भी उच्चारण करना चाहिए, जो कई रोगों का नाशक है जैसे सूर्य को अर्घ्य देकर  "ॐ भास्कराय नमः"  का जाप करना.देवी के मंदिर में महज एक परिक्रमा कर नवार्ण मंत्र का ध्यान जरूरी है.इससे सँजोए गए संकल्प और लक्ष्य सकारात्मक रूप लेते हैं.

परिक्रमा के संबंध में नियम
१.  परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए.साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी.ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती

२.  परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें.जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें.

३.  उलटी अर्थात बाये हाथ की तरफ परिक्रमा नहीं करनी चाहिये.

इस प्रकार देवी-देवताओं की परिक्रमा विधिवत करने से जीवन में हो रही उथल-पुथल व समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाता है.इस प्रकार सही परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है.

जय जय श्री राधे...

(साभार - श्री हरि मंदिर चण्डीगढ)

हिन्दुओं के संप्रदाय...

प्राचीनकाल में देव, नाग, किन्नर, असुर, गंधर्व, भल्ल, वराह, दानव, राक्षस, यक्ष, किरात, वानर, कूर्म, कमठ, कोल, यातुधान, पिशाच, बेताल, चारण आदि जातियां हुआ करती थीं। देव और असुरों के झगड़े के चलते धरती के अधिकतर मानव समूह दो भागों में बंट गए। पहले बृहस्पति और शुक्राचार्य की लड़ाई चली, फिर गुरु वशिष्ठ और विश्‍वामित्र की लड़ाई चली। इन लड़ाइयों के चलते समाज दो भागों में बंटता गया।

हजारों वर्षों तक इनके झगड़े के चलते ही पहले सुर और असुर नाम की दो धाराओं का धर्म प्रकट हुआ, यही आगे चलकर यही वैष्णव और शैव में बदल गए। लेकिन इस बीच वे लोग भी थे, जो वेदों के एकेश्वरवाद को मानते थे और जो ब्रह्मा और उनके पुत्रों की ओर से थे। इसके अलावा अनीश्वरवादी भी थे। कालांतर में वैदिक और चर्वाकवादियों की धारा भी भिन्न-भिन्न नाम और रूप धारण करती रही।

शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के झगड़े के चलते शाक्त धर्म की उत्पत्ति हुई जिसने दोनों ही संप्रदायों में समन्वय का काम किया। इसके पहले अत्रि पुत्र दत्तात्रेय ने तीनों धर्मों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव के धर्म) के समन्वय का कार्य भी किया। बाद में पुराणों और स्मृतियों के आधार पर जीवन-यापन करने वाले लोगों का संप्रदाय ‍बना जिसे स्मार्त संप्रदाय कहते हैं।

इस तरह वेद और पुराणों से उत्पन्न 5 तरह के संप्रदायों माने जा सकते हैं:- 
1. वैष्णव, 2. शैव, 3. शाक्त, 4 स्मार्त और  5. वैदिक संप्रदाय। 

वैष्णव जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं, शैव जो शिव को परमेश्वर ही मानते हैं, शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं और स्मार्त जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं। अंत में वे लोग जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं। 

हालांकि सभी संप्रदाय का धर्मग्रंथ वेद ही है। सभी संप्रदाय वैदिक धर्म के अंतर्गत ही आते हैं लेकिन आजकल यहां भेद करना जरूर हो चला है, क्योंकि बीच-बीच में ब्रह्म समाज, आर्य समाज और इसी तरह के प्राचीनकालीन समाजों ने स्मृति ग्रंथों का विरोध किया है। जो ग्रंथ ब्रह्म (परमेश्वर) के मार्ग से भटकाए, वे सभी अवैदिक माने गए हैं।

वैष्णव संप्रदाय के उप संप्रदाय : 
वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय हैं - जैसे बैरागी, दास, रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क, माध्व, राधावल्लभ, सखी, गौड़ीय आदि। वैष्णव का मूलरूप आदित्य या सूर्य देव की आराधना में मिलता है। भगवान विष्णु का वर्णन भी वेदों में मिलता है। पुराणों में विष्णु पुराण प्रमुख है। विष्णु का निवास समुद्र के भीतर माना गया है।

विष्णु के अवतार : शास्त्रों में विष्णु के 24 अवतार बताए हैं, लेकिन प्रमुख 10 अवतार माने जाते हैं - मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बु‍द्ध और कल्कि।

24 अवतारों का क्रम निम्न है-
1. आदि परषु, 2. चार सनतकुमार, 3. वराह, 4. नारद, 
5. नर-नारायण, 6. कपिल, 7. दत्तात्रेय, 8. याज्ञ, 
9. ऋषभ, 10. पृथु, 11. मत्स्य, 12. कच्छप, 
13. धन्वंतरि, 14. मोहिनी, 15. नृसिंह, 16. हयग्रीव, 
17. वामन, 18. परशुराम, 19. व्यास, 20. राम,
21. बलराम, 22. कृष्ण, 23. बुद्ध और 24. कल्कि।

वैष्णव ग्रंथ : ऋग्वेद में वैष्णव विचारधारा का उल्लेख मिलता है। ईश्वर संहिता, पाद्मतन्त, विष्णु संहिता, शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत, रामायण, विष्णु पुराण आदि।

वैष्णव पर्व और व्रत :  एकादशी, चातुर्मास, कार्तिक मास, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, होली, दीपावली आदि।

वैष्णव तीर्थ : बद्रीधाम , मथुरा , अयोध्या , तिरुपति बालाजी, श्रीनाथ, द्वारकाधीश।

वैष्णव संस्कार : 
1. वैष्णव मंदिर में विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां होती हैं। एकेश्‍वरवाद के प्रति कट्टर नहीं है। 
2. इसके संन्यासी सिर मुंडाकर चोटी रखते हैं। 
3. इसके अनुयायी दशाकर्म के दौरान सिर मुंडाते वक्त चोटी रखते हैं। 
4. ये सभी अनुष्ठान दिन में करते हैं। 
5. ये सात्विक मंत्रों को महत्व देते हैं। 
6. जनेऊ धारण कर पितांबरी वस्त्र पहनते हैं और हाथ में कमंडल तथा दंडी रखते हैं। 
7. वैष्णव सूर्य पर आधारित व्रत उपवास करते हैं। 
8. वैष्णव दाह-संस्कार की रीति है। 
9. यह चंदन का तिलक खड़ा लगाते हैं। 

वैष्णव साधु-संत :  वैष्णव साधुओं को आचार्य, संत, स्वामी आदि कहा जाता है।

शैव संप्रदाय के उप संप्रदाय : शैव में शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि उप संप्रदाय हैं। महाभारत में माहेश्वरों (शैव) के 4 संप्रदाय बतलाए गए हैं- शैव, पाशुपत, कालदमन और कापालिक। शैव मत का मूल रूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में है। 12 रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए। इनकी पत्नी का नाम है पार्वती जिन्हें दुर्गा भी कहा जाता है। शिव का निवास कैलाश पर्वत पर माना गया है।

शिव के अवतार :  शिव पुराण में शिव के भी दशावतारों के अलावा अन्य का वर्णन मिलता है, जो निम्नलिखित है- 
1. महाकाल, 2. तारा, 3. भुवनेश, 4. षोडश, 
5. भैरव, 6. छिन्नमस्तक गिरिजा, 7. धूम्रवान, 8. बगलामुखी, 
9. मातंग और 10. कमल नामक अवतार हैं। ये दसों अवतार तंत्रशास्त्र से संबंधित हैं।

शिव के अन्य 11 अवतार : 
1. कपाली, 2. पिंगल, 3. भीम, 4. विरुपाक्ष, 
5. विलोहित, 6. शास्ता, 7. अजपाद, 8. आपिर्बुध्य, 
9. शम्भू, 10. चण्ड तथा 11. भव का उल्लेख मिलता है।

इन अवतारों के अलावा शिव के दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भी 'शिव पुराण' में हुआ है जिन्हें अंशावतार माना जाता है।

शैव ग्रंथ :  वेद का श्‍वेताश्वतरा उपनिषद, शिव पुराण , आगम ग्रंथ और तिरुमुराई।

शैव व्रत और त्योहार : चतुर्दशी, श्रावण मास, शिवरा‍त्रि, रुद्र जयं‍‍ती, भैरव जयंती आदि।

शैव तीर्थ : १२ ज्योतिर्लिंगों में खास काशी , बनारस , केदारनाथ , सोमनाथ , रामेश्वरम , चिदम्बरम , अमरनाथ  और कैलाश मानसरोवर  ।

शैव संस्कार :
1. शैव संप्रदाय के लोग एकेश्वरवादी होते हैं। 
2. इसके संन्यासी जटा रखते हैं। 
3. इसमें सिर तो मुंडाते हैं, लेकिन चोटी नहीं रखते। 
4. इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं। 
5. इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं। 
6. ये निर्वस्त्र भी रहते हैं, भगवा वस्त्र भी पहनते हैं और हाथ में कमंडल, चिमटा रखकर धूनी भी रमाते हैं। 
7. शैव चन्द्र पर आधारित व्रत-उपवास करते हैं। 
8. शैव संप्रदाय में समाधि देने की परंपरा है। 
9. शैव मंदिर को शिवालय कहते हैं, जहां सिर्फ शिवलिंग होता है। 
10. ये भभूति तिलक आड़ा लगाते हैं।

शैव साधु-संत : शैव साधुओं को नाथ, अघोरी, अवधूत, बाबा, ओघड़, योगी, सिद्ध आदि कहा जाता है।

नोट :- मान्यता है कि हिन्दू धर्म में आमजनों को अग्निदाह और साधुओं को समाधि दी जाती है। उक्त जानकारी आमजनों के समझने हेतु संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत की गई है। इसे पूर्ण न समझा जाए।

शाक्त धर्म : मां पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में शक्ति को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति कहने से अर्थ वह प्रकृति नहीं हो जाती। हर मां प्रकृति है। जहां भी सृजन की शक्ति है, वहां प्रकृति ही मानी गई है इसीलिए मां को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति में ही जन्म देने की शक्ति है।

शाक्त संप्रदाय को शैव संप्रदाय के अंतर्गत माना जाता है। शाक्तों का मानना है कि दुनिया की सर्वोच्च शक्ति स्त्रैण है इसीलिए वे देवी दुर्गा को ही ईश्वर रूप में पूजते हैं। सिन्धु घाटी की सभ्यता में भी मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। शाक्त संप्रदाय प्राचीन संप्रदाय है। गुप्तकाल में यह उत्तर-पूर्वी भारत, कम्बोडिया, जावा, बोर्निया और मलाया प्राय:द्वीपों के देशों में लोकप्रिय था। बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद इसका प्रभाव कम हुआ।

मां पार्वती : मां पार्वती का मूल नाम सती है। ये 'सती' शब्द बिगड़कर शक्ति हो गया। पुराणों के अनुसार सती के पिता का नाम दक्ष प्रजा‍पति और माता का नाम मेनका है। पति का नाम शिव और पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हैं। यज्ञ में स्वाहा होने के बाद सती ने ही पार्वती के रूप में हिमालय के यहां जन्म लिया था।

इन्हें हिमालय की पुत्री अर्थात उमा हैमवती भी कहा जाता है। दुर्गा ने महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों का वध करके जनता को कुतंत्र से मुक्त कराया था। उनकी यह पवित्र गाथा मार्केण्डेय पुराण में मिलती है। उन्होंने विष्णु के साथ मिलकर मधु और कैटभ का भी ‍वध किया था।

भैरव, गणेश और हनुमान : अकसर जिक्र होता है कि मां दुर्गा के साथ भगवान भैरव, गणेश और हनुमानजी हमेशा रहते हैं। प्राचीन दुर्गा मंदिरों में आपको भैरव और हनुमानजी की मूर्तियां अवश्य मिलेंगी। दरअसल, भगवान भैरव दुर्गा की सेना के सेनापति माने जाते हैं और उनके साथ हनुमानजी का होना इस बात का प्रमाण है कि राम के काल में ही पार्वती के शिव थे।

प्रमुख पर्व नवदुर्गा : मार्कण्डेय पुराण में परम गोपनीय साधन, कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपाय संपूर्ण प्राणियों की रक्षार्थ बताया गया है। जो देवी की ९ मूर्तियांस्वरूप हैं जिन्हें 'नवदुर्गा' कहा जाता है, उनकी आराधना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक की जाती है।

धर्म ग्रंथ : शाक्त संप्रदाय में देवी दुर्गा के संबंध में 'श्रीदुर्गा भागवत पुराण' एक प्रमुख ग्रंथ है जिसमें १०८ देवी पीठों का वर्णन किया गया है। उनमें से भी ५१-५२ शक्तिपीठों का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी में दुर्गा सप्तशती भी है।

शाक्त धर्म का उद्देश्य : सभी का उद्देश्य मोक्ष है फिर भी शक्ति का संचय करो। शक्ति की उपासना करो। शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति की हम सभी को आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो। तभी तो नाथ और शाक्त संप्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं। सिद्धियां प्राप्त करते रहते हैं।

वेदों को श्रुति ग्रंथ कहा जाता है अर्थात जिस ज्ञान को परमेश्वर से सुनकर जाना गया। वेदों को छोड़कर सभी ग्रंथ स्मृति ग्रंथ कहलाते हैं अर्थात जिस ज्ञान को परंपरा के माध्यम से जाना या जिसे स्मृतियों के आधार पर जाना। अधिकतर लोग इस संप्रदाय का नाम शंकराचार्य से जोड़ते हैं। शंकराचार्य ने तो दसनामी संप्रदाय की स्थापना की थी, जो सभी शिव के उपासक शैव पंथ से हैं।

धर्मग्रंथ : सभी पुराण, स्मृतियां।

प्रमुख देवता : शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य एवं गणेश।

स्मृति ग्रंथों में मनु स्मृति सहित सभी स्मृतियां और पुराण आते हैं। वेदों को छोड़कर जो इन ग्रंथों पर आधारित जीवन-यापन करते हैं उनको स्मार्त संप्रदाय का माना जाता है। जैसे जो विष्णु को भी माने और शिव को भी, दुर्गा को भी और अन्य देवी-देवताओं का भी पूजन करें, वे सभी स्मार्त संप्रदाय के हैं। अधिकतर हिन्दू स्मार्त संप्रदाय के ही हैं ।

वैदिक संप्रदाय : हालांकि सभी संप्रदाय का धर्मग्रंथ वेद ही है। सभी संप्रदाय वैदिक धर्म के अंतर्गत ही आते हैं लेकिन आजकल यहां भेद करना जरूर हो चला है, क्योंकि बीच-बीच में ब्रह्म समाज, आर्य समाज और इसी तरह के प्राचीनकालीन समाजों ने स्मृति ग्रंथों का विरोध किया है।

संत मत : भारत के संत मत को भी वैदिक संप्रदाय का माना जाता है जैसे कबीर, दादू आदि सभी एकेश्‍वरवाद पर ही जोर देते हैं।

वैदिक धर्म - कर्म पर आधारित हैं। इसमें एक परमेश्‍वर को ही सर्वोपरि शक्ति माना जाता है।


🌹🌷🚩 श्री राम जय राम जय जय राम 🌹🌷🚩 
🌹🌺🌷 जय जय विघ्न हरण हनुमान 🌹🌺🌷



(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Sunday, 10 May 2020

हिन्दू धर्म में तिलक ।

हिन्दू धर्म में जब भी कभी कोई पूजा हो या कोई भी मांगलिक कार्य हो उसकी शुरुआत तिलक के साथ ही की जाती हैं। इसी के साथ ही मंदिर में या लोग सुबह घर से निकलने के दौरान भी तिलक लगाकर निकलते हैं । धार्मिक नजरिए से माथे पर तिलक लगाने से भगवान का आशीर्वाद मिलता है। वहीं वैज्ञानिक नजरिए की बात की जाए तो  दोनों आंखों के बीच में आज्ञा चक्र होता है। इस आज्ञा चक्र पर टीका लगाने पर हमारी एकाग्रता बढ़ती है। माथे पर तिलक लगाते समय उंगली का जो दबाव माथे पर बनता है उससे नसों का रक्त संचार काबू में रहता है और शरीर में नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। तिलक लगाने से एकाग्रता में बढ़ोतरी होती है। शरीर से आलस्य दूर होता है और दिमागी शक्ति में इजाफा होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है । माथे पर नियमित रूप से तिलक लगाने से नाड़ी मंडल की परिशुद्ध सक्रियता से इनसोमनिया और साइनस जैसे रोग से छुटकारा मिलता है।

योगी लोग मेडिटेशन शुरू करने से पहले अपने माथे पर तिलक और त्रीपुण्ड लगाते है क्योंकि इसी जगह पर आज्ञा चक्र में उपस्थित पिण्ड में जुड़ी सभी नाड़ियों का समूह होता है। 

 पुराणों में वर्णन मिलता है कि संगम तट पर गंगा स्नान के बाद तिलक लगाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है की स्नान करने के बाद पंडों द्वारा विशेष तिलक अपने भक्तों को लगाया जाता है। माथे पर तिलक लगाने के पीछे आध्यात्मिक महत्व है। दरअसल, हमारे शरीर में सात सूक्ष्म ऊर्जा केंद्र होते हैं, जो अपार शक्ति के भंडार हैं। इन्हें चक्र कहा जाता है। माथे के बीच में जहां तिलक लगाते हैं, वहां आज्ञाचक्र होता है। यह चक्र हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है, जहां शरीर की प्रमुख तीन नाडि़यां इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना आकर मिलती हैं इसलिए इसे त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है। यह गुरु स्थान कहलाता है। यहीं से पूरे शरीर का संचालन होता है। यही हमारी चेतना का मुख्य स्थान भी है। इसी को मन का घर भी कहा जाता है। इसी कारण यह स्थान शरीर में सबसे ज्यादा पूजनीय है। योग में ध्यान के समय इसी स्थान पर मन को एकाग्र किया जाता है।

तिलक लगाने से एक तो स्वभाव में सुधार आता हैं व देखने वाले पर सात्विक प्रभाव पड़ता हैं। तिलक जिस भी पदार्थ का लगाया जाता हैं उस पदार्थ की ज़रूरत अगर शरीर को होती हैं तो वह भी पूर्ण हो जाती हैं। तिलक किसी खास प्रयोजन के लिए भी लगाये जाते हैं जैसे यदि मोक्षप्राप्ती करनी हो तो तिलक अंगूठे से, शत्रु नाश करना हो तो तर्जनी से, धनप्राप्ति हेतु मध्यमा से तथा शान्ति प्राप्ति हेतु अनामिका से लगाया जाता हैं। 

आमतौर से तिलक अनामिका द्वारा लगाया जाता हैं और उसमे भी केवल चंदन ही लगाया जाता हैं तिलक संग चावल लगाने से लक्ष्मी को आकर्षित करने का तथा ठंडक व सात्विकता प्रदान करने का निमित छुपा हुआ होता हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को तिलक ज़रूर लगाना चाहिए।

हिंदू परिवारों में किसी भी शुभ कार्य में "तिलक या टीका" लगाने का विधान हैं। यह तिलक कई वस्तुओ और पदार्थों से लगाया जाता हैं। इनमें हल्दी, सिन्दूर, केशर, भस्म और चंदन आदि प्रमुख हैं, माथे पर हल्दी का चंदन लगाने से त्वचा शुद्ध होती है क्योंकि हल्दी में एंटी बेक्ट्रियल तत्व होते है जिससे रोगों से निजात मिलती है। माथे पर चंदन, रोली, कुमकुम, सिंदूर या भस्म का तिलक लगाया जाता है।  तिलक लगाने की केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि इसके कई वैज्ञानिक कारण भी हैं।

हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक निशान होते हैं। तंत्र शास्त्र में पंच गंध या अस्ट गंध से बने तिलक लगाने का बड़ा ही महत्व है तंत्र शास्त्र में शरीर के तेरह भागों पर तिलक करने की बात कही गई है, लेकिन समस्त शरीर का संचालन मस्तिष्क करता है। इसलिए इस पर तिलक करने की परंपरा अधिक प्रचलित है। 

सिंदूर का तिलक
माथे पर सिंदूर का तिलक लगाने से देवी की विशेष कृपा प्राप्‍त होती है। आप चाहें तो शुक्रवार के दिन लाल सिंदूर का तिलक मां लक्ष्‍मी को चढ़ाने के साथ ही अपने माथे पर लगाएं। इससे आपका तनाव कम होने के साथ ही आपको मां लक्ष्‍मी की कृपा भी प्राप्‍त होगी। इसके अलावा आपके घर में सुख समृद्धि आती है और भौति क सुख-सुविधाओं में इजाफा होता है।

श्रीखंड चंदन का तिलक
शमी की लकड़ी से श्रीखंड चंदन का तिलक लगाने से शनि के दोष दूर होते हैं। शमी की लकड़ी को शनि की दशा दूर करने के लिए बहुत ही असरदार माना जाता है। शनिवार के दिन शमी के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से बहुत लाभ होता है।

भभूत का तिलक
भभूत या फिर श्‍मशान की भस्‍म से तिलक करने पर भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्‍त होती है। भभूत भगवान शिव की प्रिय वस्‍तुओं में से एक माना जाता है। भगवान शिव की पूजा में भभूत का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है।

केसर और हल्‍दी का तिलक
केसर और हल्‍दी का सीधा संबंध गुरु ग्रह से होता है। अगर आपकी कुंडली में गुरु की दशा चल रही है तो आप रोजाना स्‍नान के बाद केसर या फिर हल्‍दी का तिलक लगाकर ही घर से किसी काम से निकलें। गुरुवार के दिन हल्‍दी और केसर का तिलक लगाने से विशेष लाभ होता है। ऐसा करने से गुरु ग्रह के सारे दोष खत्‍म हो जाते हैं। सफेद चंदन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर उसमें केसर मिलाकर लेप को माथे पर लगाना चाहिए या टीका लगाना चाहिए।

लाल चंदन
लाल चंदन का तिलक लगाने से गणेशजी प्रसन्‍न होते हैं। इसके साथ ही लाल चंदन का तिलक लगाने से सूर्य और बुध ग्रह भी मजबूत होते हैं। इसके साथ ही पूजा की सुपारी को घिसकर उसका तिलक माथे पर लगाने भी बुध की दशा में लाभ होता है।

एक मान्यता के अनुसार माथे के बीच खड़ा तिलक, भगवान श्रीराम के चरणों का द्योतक है। अंगूठे से गोल बिंदु व अनामिका से ऊपर की ओर लंबा तिलक ऊपर से रंगीन या गीले चावल लगाए जाते हैं।

🙏🙏


(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Saturday, 9 May 2020

🙏।। जय श्रीराम ।।🙏 7 शब्दों का अत्यंत सरल राम तारक महामंत्र।

" श्री राम, जय राम, जय जय राम " 

यह सात शब्दों वाला तारक मंत्र है। साधारण से दिखने वाले इस मंत्र में जो शक्ति छिपी हुई है, वह अनुभव का विषय है। इसे कोई भी, कहीं भी, कभी भी कर सकता है। फल बराबर मिलता है।

हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य आज यही है कि हम राम नाम का सहारा नहीं ले रहे हैं। हमने जितना भी अधिक राम नाम को खोया है, हमारे जीवन में उतनी ही विषमता बढ़ी है, उतना ही अधिक संत्रास हमें मिला है। एक सार्थक नाम के रुप में हमारे ऋषि-मुनियों ने राम नाम को पहचाना है। उन्होंने इस पूज्य नाम की परख की और नामों के आगे लगाने का चलन प्रारंभ किया। 

प्रत्येक हिन्दू परिवार में देखा जा सकता है कि बच्चे के जन्म में राम के नाम का सोहर होता है। वैवाहिक आदि सुअवसरों पर राम के गीत गाए जाते हैं। राम नाम को जीवन का महामंत्र माना गया है।

राम सर्वमय व सर्वमुक्त हैं। राम सबकी चेतना का सजीव नाम हैं। अस समर्थ रघुनायकहिं, भजत जीव ते धन्य॥ प्रत्येक राम भक्त के लिए राम उसके हृदय में वास कर सुख सौभाग्य और सांत्वना देने वाले हैं।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिख दिया है कि प्रभु के जितने भी नाम प्रचलित हैं, उन सब में सर्वाधिक श्री फल देने वाला नाम राम का ही है।

यह नाम सबसे सरल, सुरक्षित तथा निश्चित रुप से लक्ष्य की प्राप्ति करवाने वाला है। मंत्र जप के लिए आयु, स्थान, परिस्थिति, काल, जात-पात आदि किसी भी बाहरी आडम्बर का बंधन नहीं है। किसी क्षण, किसी भी स्थान पर इसे जप सकते हैं।

जब मन सहज रूप में लगे, तब ही मंत्र जप कर लें। तारक मंत्र 'श्री' से प्रारंभ होता है। 'श्री' को सीता अथवा शक्ति का प्रतीक माना गया है। राम शब्द 'रा' अर्थात् र-कार और 'म' मकार से मिल कर बना है। 'रा' अग्नि स्वरुप है। यह हमारे दुष्कर्मों का दाह करता है। 'म' जल तत्व का द्योतक है। जल आत्मा की जीवात्मा पर विजय का कारक है। 

इस प्रकार पूरे तारक मंत्र - 'श्री राम, जय राम, जय जय राम' का सार निकलता है - शक्ति से परमात्मा पर विजय। योग शास्त्र में देखा जाए तो 'रा' वर्ण को सौर ऊर्जा का कारक माना गया है। यह हमारी रीढ़-रज्जू के दाईं ओर स्थित पिंगला नाड़ी में स्थित है।

यहां से यह शरीर में पौरुष ऊर्जा का संचार करता है। 'मा' वर्ण को चन्द्र ऊर्जा कारक अर्थात स्त्री लिंग माना गया है। यह रीढ़-रज्जू के बांई ओर स्थित इड़ा नाड़ी में प्रवाहित होता है।

इसीलिए कहा गया है कि श्वास और निश्वास में निरंतर र-कार 'रा' और म-कार 'म' का उच्चारण करते रहने से दोनों नाड़ियों में प्रवाहित ऊर्जा में सामंजस्य बना रहता है। अध्यात्म में यह माना गया है कि जब व्यक्ति 'रा' शब्द का उच्चारण करता है तो इसके साथ-साथ उसके आंतरिक पाप बाहर फेंक दिए जाते हैं। इससे अंतःकरण निष्पाप हो जाता है। 

|| जय श्री राम ||


(साभार - श्री कृष्ण भारद्वाज)

Thursday, 7 May 2020

🙏 प्रभु श्रीकृष्ण अवतरण कालगणना 🙏

# भारतीय काल गणना के अनुसार #भगवान्श्रीकृष्ण को अवतार ग्रहण किए हुए 5248 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और 5249वाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ है। प्रश्न उठता है कि यह कालगणना कैसे की गई ?

# लीलापुरुषोत्तम भगवान्श्रीकृष्ण का जीवन-चरित्र अनेक प्राचीन ग्रन्थों में भरा पड़ा है। # भागवतपुराण, # विष्णुपुराण, # ब्रह्मपुराण, # ब्रह्मवैवर्तपुराण, # हरिवंशपुराण, # देवीभागवतपुराण, # आदिपुराण, # गर्गसंहिता, # महाभारत और # जैमिनीय महाभारत, आदि में भगवान् श्रीकृष्ण का विस्तृत जीवन-चरित्र प्राप्त होता है। इन ग्रन्थों ने भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन की प्रमुख घटनाओं का समय कहीं तिथि, कहीं नक्षत्र तो कहीं ऋतु में दिया है। इनके सहारे श्रीकृष्ण जन्म से लेकर उनके स्वर्गारोहण तक की समयावली प्रस्तुत हो जाती है। इसके अतिरिक्त इन ग्रन्थों में कई मुहूर्तों के नाम भी आए हैंI

विष्णुपुराण (5.1.78) एवं ब्रह्मपुराण (181.44) के अनुसार वर्षा ऋतु में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रात्रि में भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था -
प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि।
उत्पत्यामि नवम्यां तु प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि।।

देवीपुराण (50.65) के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृष लग्न में अर्द्धरात्रि की वेला में भगवती ने देवकी के गर्भ से परम पुरुष के रूप में जन्म लिया -
ततः समभवद्देवी देवक्याः परमः पुमान्।
अष्टम्यामधर्द्धरात्रे तु रोहिण्यामसिते वृषे।।

भविष्यपुराण (उत्तरपर्व, 55.14) के अनुसार जिस समय सिंह राशि पर सूर्य और वृष राशि पर चन्द्रमा था, उस भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्मी तिथि को अर्द्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था -
सिंहराशिगते सूर्ये गगने जलदाकुले।
मासि भाद्रपदेष्टम्यां कृष्णपक्षेऽर्धरात्रके।
वृषराशिस्थिते चन्द्रे नक्षत्रे रोहिणीयुते।।

हरिवंशपुराण (2.4.17) के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म के समय अभिजित् नक्षत्र, जयन्ती नामक रात्रि और विजय नामक मुहूर्त था -
अभिजिन्नाम नक्षत्रं जायन्तीनाम शर्बरी।
मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दनः।।

भविष्यपुराण (प्रतिसर्गपर्व, 1.3.82) के अनुसार द्वापर के चतुर्थ चरण के अन्त में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था -
चतुर्थे चरणान्ते च हरेर्जन्म स्मृतं बुधैः।
हस्तिनापुरमध्यस्याभिमन्योस्तनयस्ततः।।

आदिपुराण (15.15-16) के अनुसार द्वापरयुग के अन्त में और कलियुग के प्रारम्भ में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्मी तिथि को अर्द्धरात्रि में, रोहिणी नक्षत्र में जब लग्न का स्वामी उच्च स्थान में स्थित था, श्रीकृष्ण का जन्म हुआ -
द्वापरान्ते कलोरादौ व्यतीते तु शरच्छते।
प्रौष्मद्यामथाष्टम्यां कृष्णायामर्द्धरात्रकेII
रोहिणीस्थे चन्द्रमासि स्वोच्चगेऽभूज्जनिर्मम।।

महाभारत (शान्तिपर्व, 339.89-90) के अनुसार द्वापर और कलि की सन्धि के समय के आसपास कंस का वध करने के लिए मथुरा में विष्णु का अवतार हुआ था—
द्वापरस्य कलेश्चैव संधै पार्यवसानिके।
प्रादुर्भाव कंसहेतेार्मथुरायां भविष्यति।।

ब्रह्मवैवर्तमहापुराण और भागवतमहापुराण के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण इस धरातल पर 125 वर्षों से अधिक समय तक विराजमान रहे थे -
यत् पंचविंशत्यधिकं वर्षाणां शतकं गतम्।
व्यक्तवेमां स्वपदं यासि रुदन्तीं विरहातुरम्।।
(ब्रह्मवैवर्तमहापुराण, 4.109.18)

यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीयाय पंचविंशाधिकं प्रभो।।
(भागवतमहापुराण, 11.6.25)

विष्णु, वायु, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड और भागवतपुराण के अनुसार जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण परमधाम को पधारे थे, उसी दिन, उसी समय पृथिवी पर कलियुग प्रारम्भ हो गया था -
यदैव भगवान्विष्णोरंशो यातोदिवं द्विज।
वसुदेववुफलोद्भूतस्दैवात्रागतः कलि।।
(विष्णुपुराण, 4.24.108)

यस्मिन कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि।
प्रतिपन्नं कलियुगं तस्य संख्यां निबोध मे।।
(विष्णुपुराण, 4.24.113; ब्रह्माण्डपुराण, 2.74.241; वायुपुराण, 19.428.429)

यस्मिन्दिने हरिर्यातो दिनं सन्त्याज्य मेदिनीम्।
यस्मिन्नेवावतीर्णोऽयं कालक्रायो बली कलिः।।
(विष्णुपुराण, 5.38.8; ब्रह्मपुराण, 212.8)

यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथः।
तदाहरेवाप्रति बुद्धचेतसामधर्महेतुः कलिरन्ववर्ततः।।
(भागवतपुराण, 1.16.36)

हिंदू-कालगणनानुसार # द्वापरयुग 2,400 दिव्य वर्षों का एवं 8,64,000 मानव-वर्षों का होता है। वर्तमान समय में ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध के 7वें वैवस्वत # मन्वन्तर के 28वें चतुर्युग के कलियुग के प्रथम चरण का 5121वाँ वर्ष चल रहा है। भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म वैवस्वत मन्वन्तर के 28वें चतुर्युग के द्वापर के अन्त होने के लगभग 126 (125 वर्षों से कुछ अधिक) वर्ष पूर्व हुआ था जो द्वापरयुग का अन्तिम चरण है। भविष्यमहापुराण (उत्तरपर्व, 101.6) के अनुसार कलियुग का प्रारम्भ माघ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था - माघे पंचदशी राजन्कलिकालदिरुच्यते।

#आर्यभट (476-550) के अनुसार 28वें #कलियुग का प्रारम्भ 3102 ई.पू. में हुआ था। उन्होंने स्पष्ट लिखा है : ‘3 युग (सत्ययुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग) और कलियुग के 60x60 (=3600) वर्ष बीत चुके हैं और इस समय उन्हें जन्मे 23 वर्ष हुए हैं’—
षष्टब्दानां षष्ठियादाव्यतीतास्त्रयश्य युगपादाः।
त्रयधिकविंशति रब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः।।
(आर्यभटीयम्, कालक्रियापाद, 10)

उपर्युक्त श्लोक का तात्पर्य यह है कि आर्यभट्ट ने 23 वर्ष की आयु में उपर्युक्त श्लोक की रचना की है। आर्यभट्ट का जन्म मेष-संक्रांति, 476 ई. में हुआ था। इस प्रकार उपर्युक्त रचना 476+23=499 ई. की है। तब कलियुग का 3601वाँ वर्ष चल रहा था। इस प्रकार कलियुग का प्रारम्भ 3601-499=3102 ई.पू. में हुआ था।

#भास्कराचार्य द्वितीय (1114-1185) ने लिखा है : ‘छः मन्वन्तर और 7वें मन्वन्तर के 27 चतुर्युग बीत चुके हैं, जो 28वाँ चतुर्युग चल रहा है, उसके भी 3 युग बीत चुके हैं और जो चौथा कलियुग चल रहा है, उसके भी शालिवाहन-संवत् तक 3,179 वर्ष गुजर चुके हैं—
याताः षण्मन्वो युगानि भमितान्यन्यद्युगांधि त्रयं।
नन्दाद्रीन्दुगुणास्तथा शकनृपस्यान्ते कलेर्वत्सराः।।
(सिद्धान्तशिरोमणि, मध्यमाधिकार, कालमानाध्याय, 28)

# शालिवाहन संवत् का प्रारम्भ 78 ई. में उज्जयिनी-नरेश शालिवाहन (शासनकाल : 46-106 ई.) ने किया था और वर्तमान में शालिवाहन संवत् (2019-78) 1941 चल रहा है। अतः, (1941+3179) 5120 वर्ष कलियुग के बीत चुके हैं (और 5121वाँ वर्ष चल रहा है)। इस दृष्टि से भी कलियुग का प्रारम्भ (5121-2019) 3102 ई.पू. में सिद्ध होता है।

इस प्रकार (28वें) कलियुग का प्रारम्भ बहुधान्य संवत्सर में माघ शुक्ल पूर्णिमा, तदनुसार 18 फरवरी, शुक्रवार, 3102 ई.पू. को दोपहर 2 बजकर 27 मिनट और 30 सैकंड पर हुआ था, जब सात नक्षत्र एक ही राशि में एकत्र हो गए थे— यह तथ्य पुराणसम्मत, इतिहाससम्मत, ज्योतिर्विज्ञानसम्मत है। 

भारतवर्ष में प्रकाशित होनेवाले सारे पञ्चाङ्गों में ‘कलि संवत्’ लिखा होता है, जिसे गणना करके देखा जा सकता है। ग्रामण (दक्षिणी अर्काट) से प्राप्त एक चोल-अभिलेख पर कलि-वर्ष 4044 और कलि-दिन 14,77,037 अंकित है, जिसकी संगति 14 जनवरी, 943 ई. के साथ स्थापित होती है। इससे 125 वर्ष पीछे जाने पर 3227 ई.पू. प्राप्त होता है, लेकिन चूँकि भगवान् श्रीकृष्ण 125 वर्षों से अधिक समय तक जीवित रहे थे और उनका जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था जो 5 मास, 4 दिन और पीछे पड़ता है; इसलिए अंग्रेज़ी महीने के हिसाब से यह समय 21 जुलाई निकलता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मदिवस श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, तदनुसार 21 जुलाई, बुधवार और वर्ष 3228 ई.पू. निश्चित होता है। भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म से ही ‘श्रीकृष्ण संवत्’ प्रचलित है जिसका आजकल 3228+2019 = 5247वाँ वर्ष चल रहा है। अर्थात भगवान् श्रीकृष्ण को अवतार ग्रहण किए हुए आज जन्माष्टमी को 5246 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और 5247वाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ है।

28वें कलियुग के प्रारम्भ होने की तिथि माघ शुक्ल पूर्णिमा, तदनुसार 18 फरवरी, शुक्रवार और वर्ष 3102 ई.पू. (युधिष्ठिर संवत् 37) ही भगवान् श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण की भी तिथि है।

भगवान् श्रीकृष्ण की समयावली

• 3228 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 1, आयु : 0 दिन : श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, 21 जुलाई, बुधवार : मथुरा में कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से जन्म, पिता-वसुदेव; उसी दिन वसुदेव के द्वारा में नन्द-यशोदा के गोकुल स्थानांतरण; आयु : 6 दिन : भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी, 27 जुलाई, मंगलवार, षष्ठी-स्नान, कंस की सेविका पूतना का वध; आयु : 3 माह : मार्गशीर्ष : शकट-भंजन

• 3227 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 1, आयु : 5 माह, 20 दिन : माघ शुक्ल चतुर्दशी, अन्नप्राशन-संस्कार; श्रीकृष्ण संवत् 2, आयु : 1 वर्ष : त्रिणिवर्त का वध

• 3226 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 3, आयु : 2 वर्ष : महर्षि गर्गाचार्य द्वारा नामकरण-संस्कार

• 3225 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 3, आयु : 2 वर्ष 6 माह : चैत्र, यमलार्जुन (नलकूबर और मणिग्रीव) उद्धार; आयु : 2 वर्ष, 10 माह : आषाढ़, गोकुल से वृन्दावन जाना

• 3224 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 5, आयु : 4 वर्ष : वत्सासुर और बकासुर का वध

• 3223 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 6, आयु : 5 वर्ष : अघासुर का वध; आयु : 5 वर्ष : ब्रह्माजी का गर्व-भंग; भाद्रपद कृष्ण एकादशी : कालिय मर्दन और दावाग्नि-पान; आयु : 5 वर्ष, 3 माह : मार्गशीर्ष : गोपियों का चीर-हरण

• 3222 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 6, आयु : 5 वर्ष, 8 माह : ज्येष्ठ-आषाढ़ : यज्ञ-पत्नियों पर कृपा

• 3221 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 8, आयु : 7 वर्ष, 2 माह, 7 दिन : कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा : गोवर्धन पूजा; कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से सप्तमी : गोवर्धन धरणकर इन्द्र का गर्व भंग; आयु : 7 वर्ष, 2 माह, 14 दिन : कार्तिक शुक्ल अष्मी : कामधेनु द्वारा अभिषेक, भगवान् का नाम ‘गोविन्द’ पड़ा; आयु : 7 वर्ष, 2 माह, 18 दिन : कार्तिक शुक्ल द्वादशी : नन्दजी को वरुणलोक से छुड़ाकर लाना

• 3220 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 9, आयु : 8 वर्ष, 1 माह, 21 दिन : आश्विन शुक्ल पूर्णिमा : गोपियों के साथ रासलीला

• 3219 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 9, आयु : 8 वर्ष, 6 माह, 5 दिन : फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी : सुदर्शन गन्धर्व का उद्धार; आयु : 8 वर्ष, 6 माह, 21 दिन : फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा : शंखचूड़ दैत्य का वध; श्रीकृष्ण संवत् : 10, आयु : 9 वर्ष : अरिष्टासुर (वृषभासुर) और केशी दैत्य का वध, भगवान् का नाम ‘केशव’ पड़ा

• 3218 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 11, आयु : 10 वर्ष, 2 माह, 20-21 दिन : कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी : मथुरा में धनुर्भंग; कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा : मथुरा में कंस का वध, कंस के पिता उग्रसेन का मथुरा के सिंहासन पर राज्याभिषेक

• 3217 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 12 : आयु : 11 वर्ष : अवन्तिका में सांदीपनि मुनि के गरुकुल में 126 दिनों में छः अंगों सहित संपूर्ण वेदों, गजशिक्षा, अश्वशिक्षा और धनुर्वेद (कुल 64 कलाओं) का ज्ञान प्राप्त किया, पञ्चजन दैत्य का वध एवं पाञ्चजन्य शंख-धरण, सांदीपनि मुनि को गुरु-दक्षिणा

• 3216 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 13, आयु : 12 वर्ष : उपनयन (यज्ञोपवीत)-संस्कार

• 3216-3200 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 13-19, आयु : 12-28 वर्ष : मथुरा में जरासन्ध को 17 बार पराजित किया; श्रीकृष्ण संवत् : 29 , आयु : 28 वर्ष : रत्नाकर (सिंधुसागर) पर द्वारका नगरी की स्थापना, मथुरा में कालयवन की सेना का संहार

• 3199-3191 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 30-38, आयु : 29-37 वर्ष : रुक्मिणी-हरण, द्वारका में रुक्मिणी से विवाह, स्यमन्तक मणि-प्रकरण, जाम्बवती, सत्यभामा एवं कालिन्दी से विवाह, केकय देश की कन्या भद्रा से विवाह, मद्र देश की कन्या लक्ष्मणा से विवाह; कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : प्राग्ज्योतिषपुर में नरकासुर का वध, नरकासुर की कैद से 16,100 कन्याओं को मुक्तकर द्वारका भेजा, अमरावती में इन्द्र से अदिति के कुंडल प्राप्त किए, इन्द्रादि देवताओं को जीतकर पारिजात वृक्ष (कल्पवृक्ष) द्वारका लाए, नरकासुर से छुड़ायी गयी 16,100 कन्याओं से द्वारका में विवाह, शोणितपुर में बाणासुर से युद्ध, उषा और अनिरुद्ध के साथ द्वारका लौटे; पौण्ड्रक, काशीराज, उसके पुत्र सुदक्षिण और कृत्या का वध तथा काशी-दहन

• 3190 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 39, आयु : 38 वर्ष 4 माह 17 दिन : पौष शुक्ल एकादशी : द्रौपदी-स्वयंवर में पांचाल राज्य में उपस्थित

• 3189-3183 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 40-46, आयु : 39-45 वर्ष : विश्वकर्मा से कहकर पाण्डवों के लिए इन्द्रप्रस्थ का निर्माण

• 3157 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 72, आयु : 71 वर्ष : सुभद्रा-हरण में अर्जुन की सहायता

• 3155 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 74, आयु : 73 वर्ष : श्रावण, इन्द्रप्रस्थ में खाण्डव वन-दाह में अग्नि और अर्जुन की सहायता, मय दानव को सभाभवन-निर्माण के लिए आदेश

• 3153 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 76, आयु : 75 वर्ष : धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ के निमित्त इन्द्रप्रस्थ-आगमन; आयु : 75 वर्ष 2 माह 20 दिन : कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी : जरासन्ध-वध में भीम की सहायता; आयु : 75 वर्ष 3 माह : जरासन्ध के कारागार से 20,800 राजाओं को मुक्त किया, मगध के सिंहासन पर जरासन्ध-पुत्र सहदेव का राज्याभिषेक

• 3152 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 76, आयु : 75 वर्ष 6 माह 9 दिन : फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा : राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजित, शिशुपाल का वध; आयु : 75 वर्ष 7 माह : द्वारका में शिशुपाल के भाई शाल्व का वध; आयु : 75 वर्ष 10 माह 24 दिन : श्रावण कृष्ण तृतीया : प्रथम द्यूत-क्रीड़ा में द्रौपदी की लाज-रक्षा; आयु : 75 वर्ष 11 माह : श्रावण : वन में पाण्डवों से भेंट, सुभद्रा और अभिमन्यु को साथ ले द्वारका-प्रस्थान

• 3139 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 90, आयु : 89 वर्ष 1 माह 17 दिन : आश्विन शुक्ल एकादशी : अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह में बारात लेकर विराटनगर पहुँचे; आयु : 89 वर्ष 2 माह : कार्तिक : विराट की राजसभा में कौरवों के अत्याचारों और पाण्डवों के धर्म-व्यवहार का वर्णन करते हुए किसी सुयोग्य दूत को हस्तिनापुर भेजने का प्रस्ताव, द्रुपद को सौंपकर द्वारका-प्रस्थान, द्वारका में दुर्योधन और अर्जुन— दोनों की सहायता की स्वीकृति, अर्जुन का सारथ्य-कर्म स्वीकार करना; आयु : 89 वर्ष 2 माह 8 दिन : कार्तिक शुक्ल द्वितीया, रेवती नक्षत्र, मैत्र मुहूर्त : पाण्डवों का सन्धि-प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर प्रस्थान; आयु : 89 वर्ष 2 माह 19 दिन : कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी : सन्धि-प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर पहुँचे; आयु : 89 वर्ष 3 माह : मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी : राजसभा में अपने विश्वरूप का प्रदर्शन; मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से चतुर्दशी : कर्ण को पाण्डवों के पक्ष में आने के लिए समझाना; आयु : 89 वर्ष 3 माह 17 दिन : मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी : कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ‘भगवद्गीता’ का उपदेश; आयु : 89 वर्ष 4 माह : मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से पौष कृष्ण अमावस्या : महाभारत-युद्ध में अर्जुन के सारथी, युद्ध में पाण्डवों की अनेक प्रकार से सहायता

• 3138 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 90, आयु : 89 वर्ष 4 माह 7-8 दिन : पौष शुक्ल प्रतिपदा : अश्वत्थामा को 3,000 वर्षों तक जंगल में भटकने का शाप; पौष शुक्ल द्वितीया : गान्धारी द्वारा शाप-प्राप्ति; आयु : 89 वर्ष 7 माह 7 दिन : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा : धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक

• 3137-3136 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 91-92, युधिष्ठिर संवत् 2-3, आयु : 91-92 वर्ष : धर्मराज युधिष्ठिर के अश्वमेध-यज्ञ में सम्मिलित

• 3102 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 126, युधिष्ठिर संवत् 37, आयु : 125 वर्ष 4 माह : द्वारका में यदुवंश का विनाश; आयु : 125 वर्ष 5 माह : माघ : उद्धव मुनि को उपदेश; आयु : 125 वर्ष 5 माह 21 दिन : बहुधान्य संवत्सर, माघ शुक्ल पूर्णिमा, 18 फरवरी, शुक्रवार, दोपहर 2:27:30 बजे : प्रभास क्षेत्र में स्वर्गारोहण, 28वें कलियुग का प्रारम्भ


 (साभार -  डॉ0 विजय शंकर मिश्र)

मौन व्रत से महान् लाभ I

मनुष्य के शरीर में कुदरत की अजब कारीगरी समाई हुई है। योगशास्त्र कहता है कि जो मनुष्य शरीर रूपी पिंड को बराबर जानता है उस मनुष्य को समष्टी रूप ब्रह्माण्ड जानना कुछ मुश्किल नहीं।

शरीर में चार वाणी हैं। जैसे कि:- परावाणी नाभि (टुन्डी) में, पश्यन्तिवाणी छाती में, मध्यमावाणी कण्ठ (गले में), और वैखरी वाणी मुँह में है। शब्द की उत्पत्ति परावाणी में होती हैं परन्तु जब शब्द स्थूल रूप धारण करता है, तब मुँह में रही हुई वैखरी वाणी द्वारा बाहर निकलता है।

मौन दो प्रकार के हैं।

(1) वाणी से। वाणी को वश में रखना, कम बोलना, नहीं बोलना, जरूरत के अनुसार शब्दोच्चार करना आदि वाणी के मौन कहे जाते हैं। 
(2) मन से। मन को स्थिर करना, मन में बुरे विचार नहीं लाना, अनात्म विचारों को हटा कर आत्म (अध्यात्म) विचार करना, बाह्य सुख की इच्छा से मुक्त होकर अंतर सुख में मस्त होना, और मन को आत्मा के वश रखना वगैरह मन का मौनव्रत कहलाता है।

मौन व्रतधारी व्यक्तियों को मुनि के नाम से सम्बोधन करते हैं। मौन व्रतधारियों में महान् शक्ति होती है, यह बात सत्य है। उदाहरण देखिये कि जब ज्यादा प्रमाण में बोलने में आता है, तब गले की आवाज बैठ जाती है, प्यास अधिक लगती है, कण्ठ सूखता है, छाती में दर्द होता है, और बेचैनी सी मालूम पड़ती है, अर्थात् सख्त मेहनत करने वाले मजदूर वर्ग से भी अधिक परिश्रम बोलने में पड़ता है। इसलिये जितने प्रमाण में बोला जाय उतने ही प्रमाण में शरीर की शक्ति व्यय होती है।

मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि मुँह बन्द कर लेना चाहिये, परन्तु हमेशा के व्यवहार में आवश्यकतानुसार ही वाणी का उपयोग किया जावे, तो भी बहुत सी शक्ति का अपव्यय बचेगा।

दुनिया में महान् व्यक्ति होने के लिये कुदरत के कुछ नियम पालने पड़ते हैं। उन नियमों में ‘वाणी स्वातंत्र्य’ भी एक नियम है किन्तु वर्तमान समय की संसार व्यापी अव्यवस्था के कारण साधारण जीवन बिताने के लिये भी बहुत बोलना पड़ता है। लोगों को इसमें कमी करने के लिये निम्न नियमों का पालन करना चाहिये।

पालने के नियम-

(1) कोई कोई स्त्री पुरुषों को ऐसी आदत होती है कि बिना कारण ही बोला करते हैं उन्हें बोलने का प्रमाण कम करना चाहिये।

(2) बिना कारण (हँसी, दिल्लगी या दूसरे किसी के साथ) बोलने की इच्छा हो तब दोनों नासिका द्वारा श्वास खींच कर छाती के फेफड़ों में भर रखना और धीरे धीरे निकाल देना, भरते समय ईश्वर का ध्यान या अपने धर्म गुरु के बताये हुए मन्त्र का जाप करना।

(3) पखवाड़े भर में एक दिन सुबह या शाम को पौन घण्टे मौन धारण करना। उस समय “मेरा मन पवित्र होता जाता है” “मेरी जिन्दगी सुधरती जाती है” “व्यवहार या परमार्थ के लिये जो भी शुभकार्य करता हूँ वे सब कर्म लाभकारक होते हैं” इस प्रकार के विचार करना।

(4) ज्यादा समय मिल सकता हो तो अठवारे में एक वक्त या 4 दिन में एक वक्त 3 से 6 घण्टे मौन रहना।

(5) मौन धारण करते समय दूध या फलों पर रहना। हो सके तो बगीचे आदि रम्य स्थान में घूमने जाना।

(6) वायु प्रधान शरीर वाले को अधिक बोलने की आदत होती है, वास्ते उनके पेट में से और सिर में से वायु दोष निवारण करने के लिये रोज सबेरे ताँबे के लोटे में रक्खा हुआ पानी 12 या 14 ओंस पी जाना, पानी पीकर आधे घण्टे बाद सण्डास (मल विसर्जन करने) जाना चाहिये।

मौन धारण करने से लाभ।

अन्तरशक्ति बढ़ती है, महान कार्यों को कैसे करना चाहिये, वह काम शुरू करने के बाद उसका क्या परिणाम होगा, यदि विघ्न आवे तो कैसे टालना चाहिये, अटल श्रद्धा से कार्य सिद्धि आदि सन्देश हृदय में रहे हुए परमात्मा द्वारा मिलेंगे।

मौनधारियों के वचन सत्य होते हैं, सुनने वाले को सम्पूर्ण विश्वास तथा सचोट असर होता है। बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, चाय और अफीम वगैरह शरीर को अत्यन्त नुकसान करने वाले व्यसन के ऊपर काबू रखने की शक्ति आती है और धीरे धीरे खराब व्यसन छूट जाते हैं। अन्तःकरण, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार में रहे हुए छह रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का नाश होता है, सुख और दुःख के समय सौम्य दृष्टि व संतोषवृत्ति उत्पन्न होती है, ज्ञानेन्द्रियों की स्थिरता जाती रहती है, नाभि में रही हुई परावाणी में से शब्द गुप्त रूप से प्रकट होते हैं। वे शब्द मनुष्य (अपने) कल्याण के पन्थ में ले जाने वाली आज्ञा है अपने शरीर में से उत्पन्न होने वाले शब्दों के आधार से भविष्य में जाने वाले सुख या दुःख के समाचार मिल सकते हैं। पूर्व जन्म में कौन थे वह ज्ञात होता है। अपने सगे सम्बन्धी इष्ट मित्र मरने के बाद कहाँ (किस योनी, स्वर्ग, मृत्यु, पाताल, नरक अथवा मोक्ष) गये हैं उसकी समझ पड़ती है।

(साभार - श्री हरि मंदिर वृन्दावन)