Wednesday, 30 September 2020

God would have said !

”Did you know that when Einstein attended some conferences in the numerous universities of the USA, the recurring question that the students asked him was:

Do you believe in God ?

And he always answered: I believe in the God of Spinoza.

For the ones who haven't read Spinoza, I hope this will give them an idea.

Baruch De Spinoza was a Dutch philosopher, of Portuguese Jewish origin, considered one of the great rationalists of his time along with the French philosopher Rene Descartes.  Spinoza was born in Amsterdam in the 17th century of a businessman father who was successful but not wealthy.

This is the nature of the God of Spinoza:

God would have said:

"Stop  praying and giving yourselves blows on your chests, what I want you to do is to go out into the world to enjoy your life.

I want you to enjoy, to sing, to have fun and enjoy everything I've done for you.


Stop going to those gloomy, dark and cold temples that you built yourself and that you call my house.


My home is in the mountains, in the forests, the rivers, the lakes, the beaches. That's where I live and express all my love for you.


Stop blaming me for your miserable life; I never told you that you were a sinner.

Stop being so scared. I do not judge you, nor criticize you, nor am I ever angry with you, nothing bothers me, nor do I devise punishment. I am pure love.

Stop asking me forgiveness, there's nothing to forgive. If I made you... I filled you with passions, pleasures, feelings, needs, limitations, inconsistencies..of free will, how can I blame you if you do or say something out of that what I put in you? How can I punish you for being as you are, if I'm the one who made you? Do you think I could create a place to burn all my children who misbehave, for the rest of eternity?

What kind of God can do that?


Forget about any kind of commandments, of any kind of laws; those are wiles to manipulate you, to control you and  only to create guilt in you.


Respect your peers and don't do to others what you don't want for you. The only thing I ask is that you pay attention in your life, that your alert status is your guide. This life is the only thing there is, here and now and the only thing you need.

I have made you absolutely free, there are no prizes or punishments, there are no sins or virtues, no one carries a marker, no one carries a record.

You are absolutely free to create in your life a heaven or hell.


I couldn't tell you if there's anything after this life, but I can give you a tip. Live as if there wasn't. As if this was your only chance to enjoy, to love, to exist.

So, if there is nothing, then you will have enjoyed the opportunity I gave you. And if there is, be sure that I will not ask you if you behaved well or not, I will ask you. Did you like it?... did you have fun ?..What did you enjoy the most? What did you learn?...

Stop believing in me; believe is to assume, guess, imagine. I don't want you to believe in me,

I want you to feel me when you kiss your beloved, when you play with your little girl, when you love your dog, when you bathe in the sea.

Stop praising me. What kind of egoistical God do you think I am?

I'm bored of your praise, I'm fed up with thanks. Do you feel grateful? Prove it by taking care of yourself, your health, your relationships, the world around you. Do you feel  overwhelmed?... Express your joy! That's the way to praise me.

The only thing sure is that you are here, that you are alive, that this world is full of wonders.

What do you need more miracles for? Why so many explanations?

Don't look for me outside, you won't find me. Find me inside... I'm beating in there for you."

Baruch De Spinoza”


( Courtesy -  Unknown, WhatsApp forwarded message)


।। प्रतिदिन प्रातः स्मरण मंत्र।।

 # “प्रात: हाथ (कर) -दर्शनम्*

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।

करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥


# पृथ्वी क्षमा प्रार्थना*


समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।

विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥


# त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण*


ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।

गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥


 # स्नान मन्त्र *


गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥


 # सूर्यनमस्कार*


ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च

आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।

दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम् 

सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥


ॐ मित्राय नम:

ॐ रवये नम:

ॐ सूर्याय नम:

ॐ भानवे नम:

ॐ खगाय नम:

ॐ पूष्णे नम:

ॐ हिरण्यगर्भाय नम:

ॐ मरीचये नम:

ॐ आदित्याय नम:

ॐ सवित्रे नम:

ॐ अर्काय नम:

ॐ भास्कराय नम:

ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:


आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।

दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥


 # दीप दर्शन*


#शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।

शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥


#दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।

दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥


 # गणपति स्तोत्र *


गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।

द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥

विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।

द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥

विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।


विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।

लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥

नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।

गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥


शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।

प्रसन्नवदनं ध्यायेतसर्वविघ्नोपशान्तये॥


# आदिशक्तिवंदना *


सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥


 # शिवस्तुति *


कर्पूर गौरम करुणावतारं,

संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।

सदा वसंतं हृदयार विन्दे,

भवं भवानी सहितं नमामि॥


# विष्णुस्तुति *


शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥


 # श्री कृष्णस्तुति *


कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।

नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥

सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।

गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥


मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌।

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌॥


# श्रीराम वंदना *


लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।

कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥


# श्रीरामाष्टक*


हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।

गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥

हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।

बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥


# एक श्लोकी रामायण *


आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।

वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥

बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।

पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥


# सरस्वतीवंदना*


या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा माम पातु सरस्वती भगवती 

निःशेषजाड्याऽपहा॥


 # हनुमानवंदना*


अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्‌।

दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्‌।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्‌।

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥


मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥


# स्वस्तिवाचन *


ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः

स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः

स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥


# शांतिपाठ *


ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥


ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,

पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,

सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥


॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥


Tuesday, 8 September 2020

हिन्दुओं के प्राचीन 113 मंदिरों की लिस्ट

 

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अखंड भारत की चारों दिशाओं में स्थित प्राचीन व भव्य 113 मंदिरों की लिस्ट। यदि आप आध्यात्मिक अनुभव लेना चाहते हैं तो यहां जरूर जाएं।

हिन्दू धर्म : तीर्थ करना  जरूरी है ।

1. काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी, उत्तरप्रदेश

2. श्रीरामनथा स्वामी मंदिर रामेश्वरम्, तमिलनाडु

3. श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी, ओडिशा

4. सूर्य मंदिर कोणार्क, ओडिशा

5. श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर तिरूअनंतपुरम, केरल

6. श्रीमहाकालेश्वर मंदिर उज्जैन, मध्यप्रदेश

7. श्रीगंगा सरस्वती मंदिर बसरा, तेलंगाना

8. एकलिंगनाथजी मंदिर, उदयपुर, राजस्थान

9. श्रीद्वारकाधीश, गुजरात

10. श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर, मथुरा

11. श्रीदक्षिणेश्वर मंदिर, कोलकाता

12. श्रीसिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई

13. श्रीवेंकटेश्वर मंदिर, तिरूपति

14. कंधारिया महादेव मंदिर, खजुराहो

15. केदारनाथ, उत्तराखंड

16. श्रीमुरूदेश्वर स्वामी मंदिर, कर्नाटक

17. पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू

18. गंगोत्री मंदिर, उत्तराखंड

19. श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा

20. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर :

21. बद्रीनारायण मंदिर, उत्तराखंड

22.रघुनाथ मंदिर, जम्मू

23. श्रीसोमेश्वर स्वामी मंदिर, गुजरात

24. श्री अयप्पा मंदिर, केरल

25. श्री मीनाक्षी मंदिर, मदुरै

26. श्री कृष्ण मंदिर, केरल

27. श्री रंगनाथा स्वामी मंदिर, श्रीरंगम, तमिलनाडु

28. श्री थिल्लई नटराज मंदिर, चिदंबरम, तमिलनाडु

29. श्री कनक दुर्गा देवी मंदिर, विजयवाडा, आंध्रप्रदेश

30. श्री सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर, भद्राचलम, तेलंगाना

31. श्री नरसिम्हा मंदिर, अहोबिलम, आंध्र प्रदेश

32. विरूपक्ष मंदिर, हम्पी, कर्नाटक

33. एकमबरेश्वर मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु

34. श्री अंबाजी मंदिर, बनासकांठा, गुजरात

35. श्री चामुंडेश्वरी मंदिर, मैसूर, कर्नाटक

36. बृहदीश्वरर मंदिर, थंजावुर, तमिलनाडु

37. होयसेलेश्वरा मंदिर, हलेबिडु, कर्नाटक

38. श्री अरूणाचलेश्वर मंदिर, तिरूवन्नामलाई, तमिलनाडु

39. कंधारिया महादेव मंदिर, खजुराहो, मध्यप्रदेश

40. श्री चतुर्मुख ब्रह्मलिंगेश्वर मंदिर, चेबरोलु, आंध्र प्रदेश

41. एरावटेश्वर मंदिर, दारासुरम, तमिलनाडु

42. श्री मुरूदेश्वर स्वामी मंदिर, भटकल, कर्नाटक

43. शीतला माता मंदिर, गुड़गांव

44. श्री मंजुनाथ मंदिर, कर्नाटक

45. श्री जोगुलंब मंदिर, तेलंगाना

46. मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार

47. श्री चेन्नकेश्वर मंदिर, कर्नाटक

48. श्री बैजनाथ मंदिर, हिमाचल

49. कैलाशनाथ मंदिर, तमिलनाडु

50. श्री वीरभद्र मंदिर, आंध्र प्रदेश

51. श्री ग्रश्नेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र

52. श्री कृष्ण मंदिर, कर्नाटक

53. श्री मूकम्बिका देवी मंदिर, कोल्लूर, कर्नाटक

44. श्री वरदराजा स्वामी मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु

55. श्री वीर वेंकट सत्यनारायण स्वामी मंदिर, अन्नावरम्, आंध्र प्रदेश

56. श्री बैद्यनाथ मंदिर, झारखंड

57. श्री वरह लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर, सिम्हाचलम, आंध्र प्रदेश

58. श्री लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर

59. श्री राम लला मंदिर, अयोध्या

60. श्रीमुखलिंगेश्वर मंदिर, श्रीकाकुलम, आंध्र प्रदेश

61. त्रिपुरेश्वरी मंदिर, उदयपुर, त्रिपुरा

62. श्री मुक्तेश्वर मंदिर, भुवनेश्वर

63. यमुनोत्री मंदिर, उत्तराखंड

64. कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु

65. वेदनारायण स्वामी मंदिर, चित्तूर, आंध्र प्रदेश

66. श्रीमुंडेश्वरी मंदिर, बिहार

67. वडक्कमनाथन मंदिर, केरल

68. श्रीमहालसा नारायणी देवी मंदिर, पोंडा, गोवा

69.श्रीसूर्य मंदिर, मोधेरा, गुजरात

70. श्रीमल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर, श्रीसैलम, आंध्र प्रदेश

71.श्री राज माता झन्डे वाला मन्दिर शाहदरा दिल्ली

72. कामाख्या मंदिर, गुवाहाटी, असम

73. त्रयम्बकेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र

74. रामप्पा मंदिर, तेलंगाना

75. श्रीवैकुंटनाथ स्वामी, श्री वैकुंठम, तमिलनाडु

76. श्रीवैकोम महादेव मंदिर, केरल

77. दन्तेश्वरी मंदिर, छत्तीसगढ़

78. महानन्दीश्वर मंदिर, महानन्दी, आंध्र प्रदेश

79. श्री महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर, महाराष्ट्र

80. श्रीवरसिद्धि विनायक मंदिर, कनिपक्कम, आंध्र प्रदेश

81. श्रीमुर्गन मंदिर, तमिलनाडु

82. श्रीथिरूनारायण स्वामी मंदिर, मेलकोट, कर्नाटक

83. श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर, चम्बा, हिमाचल प्रदेश

84. भद्र मारूति मंदिर, महाराष्ट्र

85. तुलजा भवानी मंदिर, महाराष्ट्र

86. श्री सलासर हनुमान मंदिर, सलासर, राजस्थान

87. श्रीनैना देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश

88. मन्नारशाला श्रीनागराज मंदिर, अलप्पुझा, केरल

89. श्रीकरमंध मंदिर, श्रीकरमम, आंध्र प्रदेश

90. श्रीशांता दुर्गा मंदिर, कावालेम, गोवा

91. जगद्पिता ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर

92. श्रीविष्णुपद मंदिर, गया

93. श्रीबद्रीनारायण मंदिर, बद्रीनाथ

94. श्रीचौंसठ योगिनी मंदिर, ओडिशा

95. श्रीकैलाशनाथ मंदिर, एलोरा

96. श्रीमेहंदीपुर बालाजी, मेहंदीपुर राजस्थान

98. श्रीलक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर, यादगिरीगट्टा, तेलंगाना

99. हनुमानधारा, चित्रकुट उत्तर प्रदेश

100. हिंगलाज माता मंदिर, बलूचिस्तान, पाकिस्तान

101. मंचमुख हनुमान मंदिर, कराची, पाकिस्तान

102. यशोरेश्वरी, जिला खुलना, बांग्लादेश

103. श्री शबरी मंदिर गुजरात

104. शनि मंदिर, शिंगणापुर, महाराष्ट्र

105. श्रीमहाकालीका मंदिर, पावागढ़, गुजरात

106. कैलाश मानसरोवर, तिब्बत, चीन

107. बाबा अमरनाथ, कश्मीर, जम्मू और कश्मीर

108. श्रीवेष्णोदेवी मंदिर, जम्मू, जम्मू और कश्मीर

109. श्री गजानन महाराज, शेगांव, महाराष्ट्र

110. श्री बाबा रामदेव मंदिर, रुणिचा धाम रामदेवरा, राजस्थान

111. श्री गोरखनाथ मंदिर गोरखिया राजस्थान                

112 मकर ध्वज बाला जी धाम ब्यावर अजमेर                         

113 डेहरु माता मन्दिर खिवसर नागौर

🙏 जय श्रीकृष्ण जय श्रीराम। 🙏

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Wednesday, 19 August 2020

शिवलिंग के प्रकार एवं महत्त्व ।

 


शिवलिंग के प्रकार एवं महत्त्व 
 
🔱 मिश्री(चीनी) से बने शिव लिंग कि पूजा से रोगो का नाश होकर सभी प्रकार से सुखप्रद होती हैं।

🔱 फूलों से बने शिव लिंग कि पूजा से भूमि-भवन कि प्राप्ति होती हैं।

🔱 जौं, गेहुं, चावल तीनो का एक समान भाग में मिश्रण कर आटे के बने शिवलिंग कि पूजा से परिवार में सुख समृद्धि एवं संतान का लाभ होकर रोग से रक्षा होती हैं।

🔱 किसी भी फल को शिवलिंग के समान रखकर उसकी पूजा करने से फलवाटिका में अधिक उत्तम फल होता हैं।

🔱 यज्ञ कि भस्म से बने शिव लिंग कि पूजा से अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

🔱 यदि बाँस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करने से वंश वृद्धि होती है।

🔱 दही को कपडे में बांधकर निचोड़ देने के पश्चात उससे जो शिवलिंग बनता हैं उसका पूजन करने से समस्त सुख एवं धन कि प्राप्ति होती हैं।

🔱 गुड़ से बने शिवलिंग में अन्न चिपकाकर शिवलिंग बनाकर पूजा करने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होती हैं।

🔱 आंवले से बने शिवलिंग का रुद्राभिषेक करने से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

🔱 कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करने से आध्यात्मिक उन्नती प्रदत एवं मुक्ति प्रदत होता हैं।

🔱 यदि दुर्वा को शिवलिंग के आकार में गूंथकर उसकी पूजा करने से अकाल-मृत्यु का भय दूर हो जाता हैं।

🔱 स्फटिक के शिवलिंग का पूजन करने से व्यक्ति कि सभी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं।

🔱 मोती के बने शिवलिंग का पूजन स्त्री के सौभाग्य में वृद्धि करता हैं।

🔱 स्वर्ण निर्मित शिवलिंग का पूजन करने से समस्त सुख-समृद्धि कि वृद्धि होती हैं।

🔱 चांदी के बने शिवलिंग का पूजन करने से धन-धान्य बढ़ाता हैं।

🔱 पीपल कि लकडी से बना शिवलिंग दरिद्रता का निवारण करता हैं।

🔱 लहसुनिया से बना शिवलिंग शत्रुओं का नाश कर विजय प्रदत होता हैं।

🔱 बिबर के मिट्टी के बने शिवलिंग का पूजन विषैले प्राणियों से रक्षा करता है।

🔱 पारद शिवलिंग का अभिषेक सर्वोत्कृष्ट माना गया है घर में पारद शिवलिंग सौभाग्य, शान्ति, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अत्यधिक सौभाग्यशाली है। दुकान, ऑफिस व फैक्टरी में व्यापारी को बढाऩे के लिए पारद शिवलिंग का पूजन एक अचूक उपाय है। 

शिवलिंग के मात्र दर्शन ही सौभाग्यशाली होता है। इसके लिए किसी प्राणप्रतिष्ठा की आवश्कता नहीं हैं। पर इसके ज्यादा लाभ उठाने के लिए पूजन विधिक्त की जानी चाहिए।

▪️ शिव का अर्थ शुभ और लिंग का अर्थ ज्योतिपिंड। शिवलिंग 'ब्रह्माण्ड' या ब्रह्मांडीय अंडे के आकार का प्रतिनिधित्व करता है। दो प्रकार के शिवलिंग होते हैं। पहला उल्कापिंड की तरह काला अंडाकार लिए हुए। इस तरह के शिवलिंग को ही ज्योर्तिलिंग कहते हैं। दूसरा मानव द्वारा निर्मित पारे से बना शिवलिंग होता है। इसे पारद शिवलिंग कहा जाता है। शिवलिंग ब्रह्मांड और ब्रह्मांड की समग्रता का प्रतिनिधित्व करता है। ब्रह्मांड अंडाकार ही है जो एक अंडाकार शिवलिंग की तरह नजर आता है।

 
🔱 शिवलिंग के प्रकार 🔱

शिवलिंग के प्रमुख दो प्रकार अंडाकार और पारद शिवलिंग के अलावा शिवलिंग के मुख्‍यत: 6 प्रकार बताए गए हैं।
 
🚩 देव लिंग:- जिस शिवलिंग को देवताओं या अन्य प्राणियों द्वारा स्थापित किया गया हो, उसे देवलिंग कहते हैं। वर्तमान समय में धरती पर मूल पारंपरिक रूप से यह देवताओं के लिए पूजित है।
 
🚩 आसुर लिंग:- असुरों द्वारा जिसकी पूजा की जाए वह असुर लिंग। रावण ने एक शिवलिंग स्थापित किया था, जो असुर लिंग था। देवताओं से द्वैष रखने वाले रावण की तरह शिव के असुर या दैत्य परम भक्त रहे हैं। 

🚩 अर्श लिंग:- प्राचीन काल में अगस्त्य मुनि जैसे संतों द्वारा स्थापित इस तरह के लिंग की पूजा की जाती थी।

🚩 पुराण लिंग:- पौराणिक काल के व्यक्तियों द्वारा स्थापित शिवलिंग को पुराण शिवलिंग कहा गया है। इस लिंग की पूजा पुराणिकों द्वारा की जाती है।
 
🚩 मनुष्य लिंग:- प्राचीनकाल या मध्यकाल में ऐतिहासिक महापुरुषों, अमीरों, राजा-महाराजाओं द्वारा स्थापित किए गए लिंग को मनुष्य शिवलिंग कहा गया है।
 
🚩 स्वयंभू लिंग:- भगवान शिव किसी कारणवश स्वयं शिवलिंग के रूप में प्रकट होते हैं। इस तरह के शिवलिंग को स्वयंभू शिवलिंग कहते हैं। भारत में स्वयंभू शिवलिंग कई जगहों पर हैं। वरदान स्वरूप जहां शिव स्वयं प्रकट हुए थे।

भक्त लोग भगवान शिव के प्रतिक शिवलिंग को अपनी श्रद्धाअनुसार भिन्न भिन्न तरीके से बनाकर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। भगवान राम ने भी एक शिवलिंग रामेश्वरम में बनाया था। कहते हैं कि यह एक विशेष प्रकार की रेत का था जिसने बाद में ठोस रूप ले लिया था। 

(साभार  - डॉ0 विजय शंकर मिश्र)

Tuesday, 11 August 2020

जन्माष्टमी


आज का पर्व भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव है। उनका जन्म भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जन्माष्टमी पर्व हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। भगवान श्रीकृष्ण के भक्त इस पर्व को बड़ी धूमधाम के साथ मनाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। वे वसुदेव और देवकी की पुत्र थे। मथुरा के कारावास में उनका जन्म हुआ था और गोकुल में यशोदा और नन्द के यहां उनका लालन पालन हुआ था। 

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में हुआ था। हालांकि भगवान हर युग में जन्म लेते हैं। द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म क्यों हुआ था इस बात को स्वयं लीलाधर ने गीता के एक श्लोक में अपने अवतरित होने के कारण को बताया है। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में अर्जुन को यह बताया था कि जब जब धरती पर पाप बढ़ेगा। धर्म का नाश होगा। साधु-संतों का जीना मुश्किल हो जाएगा उस समय धर्म की पुनः स्थापना के लिए भगवान विष्णु अवतरित होंगे।

जन्माष्टमी पर लोग कान्हा जी के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं। कई लोग अपने घरों में बाल गोपाल को रखते हैं और उनकी सेवा एक छोटे बच्चे की भांति की जाती है। मान्यता है कि लड्डू गोपाल की सेवा से घर की सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं। लड्डू गोपाल के प्रसन्न होने से व्यक्ति का मन बहुत प्रसन्न रहता है। लड्डू गोपाल भाव के भूखे होते हैं।  

बाल गोपाल की पूजा की सावधानियां

सबसे पहले सुबह उठकर घर पर रखे बाल गोपाल को गंगा जल मिश्रित साफ पानी से स्नान करवाएं, दिन के हिसाब से रंग के कपड़े का चयन कर पहनाएं जैसे सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को नारंगी, शनिवार को नीला और रविवार को लाल कपड़ा, टोपी लगाएं, लड्डू गोपाल के श्रृंगार में उनके कान की बाली, कलाई में कड़ा, हाथों में बांसुरी और मोरपंख होना चाहिए। चंदन का टीका लगाएं। पूजा के बर्तन को जरूर साफ करें। लड्डू गोपाल को भोग में मक्खन, मिश्री और तुलसी के पत्ते प्रिय होते हैं। झूला झूलाएं और फिर झूले में लगे परदे को बंद करना ना भूले।  

जिन घरों में बाल गोपाल हैं वहां मांस-मदिरा का सेवन, गलत व्यवहार और अधार्मिक कार्यों से बचना चाहिए। रात को सोने से पहले बाल गोपाल को सुलाने के बाद ही सोएं। 

जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल के भोग

जन्माष्टमी के दिन आटे की पंजीरी बनाकर लड्डू गोपाल को भोग लगाएं। आटे की पंजीरी काफी स्वादिष्ट होती है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आटे की पंजीरी लड्डू गोपाल को काफी पसंद है।

लड्डू गोपाल को मक्खन बहुत पसंद है। उन्हें माखन चोर भी कहा जाता है। लड्डू गोपाल को जन्माष्टमी के दिन मक्खन मिश्री का भोग अवश्य लगाएं। 

जन्माष्टमी के पावन दिन लड्डू गोपाल को मखाना पाग का भोग लगाएं। लड्डू गोपाल को मखाना पाग मिठाई काफी पसंद है।

लड्डू गोपाल को जन्माष्टमी के दिन मखाने की खीर का भोग लगाएं। लड्डू गोपाल को दूध, घी, मक्खन और मेवे से बने पकवान काफी पसंद होते हैं। मखाने की खीर बनाने के लिए आपको काजू, बादाम, घी और मखानों की आवश्यकता पड़ेगी।

जन्माष्टमी के पावन दिन पंचामृत का बहुत अधिक महत्व होता है। जन्माष्टमी के दिन पंचामृत से लड्डू गोपाल का अभिषेक किया जाता है।  पंचामृत बनाने के लिए आपको घी, बतासे, दूध, दही, शहद, गंगाजल और तुलसी की आवश्यकता पड़ेगी। तुलसी पहले दिन तोड़ कर रख लें।

🙏 ‼ वृन्दावन बिहारीलाल की जय ‼ 🙏

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Friday, 7 August 2020

उपनिषदों के पांच वचन

हिन्दुओं का धर्मग्रंथ है वेद। वेद के 4 भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। चारों के अंतिम भाग या तत्वज्ञान को वेदांत और उपनिषद कहते हैं। उपनिषदों की संख्या लगभग 1,000 बताई गई है। उसमें भी 108 महत्वपूर्ण हैं। ये उपनिषद छोटे-छोटे होते हैं। लगभग 5-6 पन्नों के। इन उपनिषदों का सार या निचोड़ है भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कही गई गीता। इतिहास ग्रंथ महाभारत को पंचम वेद माना गया है। वाल्मीकि रामायण और 18 पुराणों को भी इतिहास ग्रंथों की श्रेणी में रखा गया है।

।।प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।

अर्थ : जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा? उपनिषदों को जिसने भी पढ़ा और समझा, यह मानकर चलिए कि उसका जीवन बदल गया। उसकी सोच बदल गई। उपनिषदों से ऊपर कुछ भी नहीं। दुनिया का संपूर्ण दर्शन, विज्ञान और धर्म उपनिषदों में समाया हुआ है। आओ हम जानते हैं उपनिषदों के उन 5 वचनों को जिसे हर मनुष्य को याद रखना चाहिए।

पहला वचन : आहार शुद्धि से प्राणों के सत की शुद्धि होती है, सत्व शुद्धि से स्मृति निर्मल और स्थिरमति (जिसे प्रज्ञा कहते हैं) प्राप्त होती है। स्थिर बुद्धि से जन्म-जन्मांतर के बंधनों और ग्रंथियों का नाश होता है और बंधनों और ग्रंथियों से मुक्ति ही मोक्ष है। अत: आहार शुद्धि प्रथम नियम और प्रतिबद्धता है।

आहार केवल मात्र वही नहीं जो मुख से लिया जाए, आहार का अभिप्राय है स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर को पुष्ट और स्वस्थ रखने के लिए इस दुनिया से जो खाद्य लिया जाए।

1. कान के लिए आहार है शब्द या ध्वनि।

2. त्वचा के लिए आहार है स्पर्श।

3. नेत्रों के लिए आहार है दृश्य या रूप जगत।

4. नाक के लिए आहार है गंध या सुगंध।

5. जिह्वा के लिए आहार है अन्न और रस।

6. मन के लिए आहार है उत्तम विचार और ध्यान।

अत: ज्ञानेन्द्रियों के जो 5 दोष हैं जिससे चेतना में विकार पैदा होता है, उनसे बचें।


दूसरा वचन : प्रत्येक पूर्ण है। चाहे वह व्यक्ति हो, जगत हो, पत्थर, वृक्ष या अन्य कोई ब्रह्मांड हो, क्योंकि उस पूर्ण से ही सभी की उत्पत्ति हुई है। स्वयं की पूर्णता को प्राप्त करने के लिए ध्यान जरूरी है। जिस तरह एक बीज खिलकर वृक्ष बनकर हजारों बीजों में बदल जाता है, वैसी ही मनुष्य की भी गति है। यह संसार उल्टे वृक्ष के समान है। व्यक्ति के मस्तिष्क में उसकी पूर्णता की जड़ें हैं। ऐसा उपनिषदों में लिखा है।


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ -वृहदारण्यक उपनिषद

 

अर्थ : अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।


तीसरा वचन : जो व्यक्ति परस्पर सह-अस्तिव की भावना रखता है, मनुष्यों में वह श्रेष्ठ है। सभी के स्वास्थ्य और रक्षा की कामना करने वाला ही खुद के मन को निर्मल बनाकर श्रेष्ठ माहौल को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति निम्नलिखित भावना को आत्मसात करता है, उसका जीवन श्रेष्ठ बनता जाता है।


ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ -कठोपनिषद

 

अर्थ : परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। उक्त तरह की भावना रखने वाले का मन निर्मल रहता है। निर्मल मन से निर्मल भविष्य का उदय होता है।


।।शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।। -उपनिषद

 

अर्थ : शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है। अर्थात शरीर को सेहतमंद बनाए रखना जरूरी है। इसी के होने से सभी का होना है अत: शरीर की रक्षा और उसे निरोगी रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है। पहला सुख निरोगी काया।


।। येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:।

ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।। -उपनिषद


अर्थ : जिसके पास विद्या, तप, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं, वह मनुष्य ऐसा जीवन व्यतीत करते हैं जैसे एक मृग। अर्थात जिस मनुष्य ने किसी भी प्रकार से विद्या अध्ययन नहीं किया, न ही उसने व्रत और तप किया, थोड़ा बहुत अन्न-वस्त्र-धन या विद्या दान नहीं दिया, न उसमें किसी भी प्रकार का ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है, ऐसे मनुष्य इस धरती पर भार होते हैं। मनुष्य रूप में होते हुए भी पशु के समान जीवन व्यतीत करते हैं।


(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Monday, 27 July 2020

Kalpa (Sanskrit: कल्प kalpa)



Kalpa (Sanskrit: कल्प kalpa) is a Sanskrit word meaning a relatively long period of time (by human calculation) in Hindu and Buddhist cosmology.


Generally speaking, a kalpa is the period of time between the creation and recreation of a world or universe. The definition of a kalpa equaling 4.32 billion years in the Puranas—specifically Vishnu Purana and Bhagavata Purana.


The duration of the material universe is limited. It is manifested in cycles of kalpas. A kalpa is a day of Brahmā, and one day of Brahmā consists of a thousand cycles of four yugas, or ages: Satya Yuga, Treta Yuga, Dvapara Yuga and Kali Yuga. The cycle of Satya is characterized by virtue, wisdom and religion, there being practically no ignorance and vice, and the yuga lasts 1,728,000 years. In the Tretā-yuga vice is introduced, and this yuga lasts 1,296,000 years. In the Dvāpara-yuga there is an even greater decline in virtue and religion, vice increasing, and this yuga lasts 864,000 years. And finally in Kali-yuga (the yuga we have now been experiencing over the past 5,000 years) there is an abundance of strife, ignorance, irreligion and vice, true virtue being practically nonexistent, and this yuga lasts 432,000 years. 

 

In Kali-yuga vice increases to such a point that at the termination of the yuga the Supreme Lord Himself appears as the Kalki avatāra, vanquishes the demons, saves His devotees, and commences another Satya-yuga. Then the process is set rolling again. 

 

These four yugas, rotating a thousand times, comprise one day of Brahmā, and the same number comprise one night.. According to the Mahabharata, 12 months of Brahma (=360 days) constitute his year, and 100 such years are the life cycle of the universe. Brahmā lives one hundred of such "years" and then dies. 100 such years of "Brahma" is called a "Maha-Kalpa". These "hundred years" total 311 trillion 40 billion (311,040,000,000,000) earth years.  Fifty years of Brahma are supposed to have elapsed, and we are now in the fifty-first.

 

A Satya Yuga = 1,728,000 Earth  years

A Treta Yuga =  1,296,000 Earth years

A Dwapara Yuga = 864,000 Earth years

A Kali Yuga = 432,000 Earth years

A Mahayuga = Satya +Treta + Dwapara + Kali Yugas = 4,320,000 Earth Years

 

A Manvantara = 71 Yuga Cycles (Satya, Treta, Dwapara & Kali Yugas) with Sandhikala

A Sandhikala =  Equal to the length of a Satya-yuga (1,728,000) years

A Kalpa = 1,000 Chaturyuga = 4.32 Billion Earth Years

 

One day of Brahma = One Thousand Mahayuga = 14 Manvantaras + 15 Sandhikalas 

Two such Kalpa = Day and Night of Brahma

1 Day of Brahma = 2 Kalpa's = 4.32 X 2 Billion Earth Years = 8.64 Billion Earth Years

A month of Brahma = 30 days of Brahma (Day and Night) = 60 Kalpa

30 Days of Brahma = 30 X 8.64 Billion Earth Years = 259.2 Billion Earth  Years

1 Years of Brahma = 360 Brahma Days = 8.64 Billion Years X 360 = 3110.4 Billion Earth Years

A Mahakalpa = 100 Years of Brahma = 311, 000.4 Billion Earth Years

 

8000 such "Maha-Kalpa"-s form one "Yuga of Brahma", whose length is 2.4 Quintillion years. There are other greater cycles whose lengths are 22.3 Sextillion years, 670 Sextillion years and 201 Septillion years respectively.


By these calculations the life of Brahmā seems fantastic and interminable, but from the viewpoint of eternity it is as brief as a lightning flash. In the Causal Ocean there are innumerable Brahmās rising and disappearing like bubbles. Brahmā and his creation are all part of the material universe, and therefore they are in constant flux.


This much knowledge in 
Puranas, really beyond imagination.