Wednesday, 19 August 2020

शिवलिंग के प्रकार एवं महत्त्व ।

 


शिवलिंग के प्रकार एवं महत्त्व 
 
🔱 मिश्री(चीनी) से बने शिव लिंग कि पूजा से रोगो का नाश होकर सभी प्रकार से सुखप्रद होती हैं।

🔱 फूलों से बने शिव लिंग कि पूजा से भूमि-भवन कि प्राप्ति होती हैं।

🔱 जौं, गेहुं, चावल तीनो का एक समान भाग में मिश्रण कर आटे के बने शिवलिंग कि पूजा से परिवार में सुख समृद्धि एवं संतान का लाभ होकर रोग से रक्षा होती हैं।

🔱 किसी भी फल को शिवलिंग के समान रखकर उसकी पूजा करने से फलवाटिका में अधिक उत्तम फल होता हैं।

🔱 यज्ञ कि भस्म से बने शिव लिंग कि पूजा से अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

🔱 यदि बाँस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करने से वंश वृद्धि होती है।

🔱 दही को कपडे में बांधकर निचोड़ देने के पश्चात उससे जो शिवलिंग बनता हैं उसका पूजन करने से समस्त सुख एवं धन कि प्राप्ति होती हैं।

🔱 गुड़ से बने शिवलिंग में अन्न चिपकाकर शिवलिंग बनाकर पूजा करने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होती हैं।

🔱 आंवले से बने शिवलिंग का रुद्राभिषेक करने से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

🔱 कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करने से आध्यात्मिक उन्नती प्रदत एवं मुक्ति प्रदत होता हैं।

🔱 यदि दुर्वा को शिवलिंग के आकार में गूंथकर उसकी पूजा करने से अकाल-मृत्यु का भय दूर हो जाता हैं।

🔱 स्फटिक के शिवलिंग का पूजन करने से व्यक्ति कि सभी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं।

🔱 मोती के बने शिवलिंग का पूजन स्त्री के सौभाग्य में वृद्धि करता हैं।

🔱 स्वर्ण निर्मित शिवलिंग का पूजन करने से समस्त सुख-समृद्धि कि वृद्धि होती हैं।

🔱 चांदी के बने शिवलिंग का पूजन करने से धन-धान्य बढ़ाता हैं।

🔱 पीपल कि लकडी से बना शिवलिंग दरिद्रता का निवारण करता हैं।

🔱 लहसुनिया से बना शिवलिंग शत्रुओं का नाश कर विजय प्रदत होता हैं।

🔱 बिबर के मिट्टी के बने शिवलिंग का पूजन विषैले प्राणियों से रक्षा करता है।

🔱 पारद शिवलिंग का अभिषेक सर्वोत्कृष्ट माना गया है घर में पारद शिवलिंग सौभाग्य, शान्ति, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अत्यधिक सौभाग्यशाली है। दुकान, ऑफिस व फैक्टरी में व्यापारी को बढाऩे के लिए पारद शिवलिंग का पूजन एक अचूक उपाय है। 

शिवलिंग के मात्र दर्शन ही सौभाग्यशाली होता है। इसके लिए किसी प्राणप्रतिष्ठा की आवश्कता नहीं हैं। पर इसके ज्यादा लाभ उठाने के लिए पूजन विधिक्त की जानी चाहिए।

▪️ शिव का अर्थ शुभ और लिंग का अर्थ ज्योतिपिंड। शिवलिंग 'ब्रह्माण्ड' या ब्रह्मांडीय अंडे के आकार का प्रतिनिधित्व करता है। दो प्रकार के शिवलिंग होते हैं। पहला उल्कापिंड की तरह काला अंडाकार लिए हुए। इस तरह के शिवलिंग को ही ज्योर्तिलिंग कहते हैं। दूसरा मानव द्वारा निर्मित पारे से बना शिवलिंग होता है। इसे पारद शिवलिंग कहा जाता है। शिवलिंग ब्रह्मांड और ब्रह्मांड की समग्रता का प्रतिनिधित्व करता है। ब्रह्मांड अंडाकार ही है जो एक अंडाकार शिवलिंग की तरह नजर आता है।

 
🔱 शिवलिंग के प्रकार 🔱

शिवलिंग के प्रमुख दो प्रकार अंडाकार और पारद शिवलिंग के अलावा शिवलिंग के मुख्‍यत: 6 प्रकार बताए गए हैं।
 
🚩 देव लिंग:- जिस शिवलिंग को देवताओं या अन्य प्राणियों द्वारा स्थापित किया गया हो, उसे देवलिंग कहते हैं। वर्तमान समय में धरती पर मूल पारंपरिक रूप से यह देवताओं के लिए पूजित है।
 
🚩 आसुर लिंग:- असुरों द्वारा जिसकी पूजा की जाए वह असुर लिंग। रावण ने एक शिवलिंग स्थापित किया था, जो असुर लिंग था। देवताओं से द्वैष रखने वाले रावण की तरह शिव के असुर या दैत्य परम भक्त रहे हैं। 

🚩 अर्श लिंग:- प्राचीन काल में अगस्त्य मुनि जैसे संतों द्वारा स्थापित इस तरह के लिंग की पूजा की जाती थी।

🚩 पुराण लिंग:- पौराणिक काल के व्यक्तियों द्वारा स्थापित शिवलिंग को पुराण शिवलिंग कहा गया है। इस लिंग की पूजा पुराणिकों द्वारा की जाती है।
 
🚩 मनुष्य लिंग:- प्राचीनकाल या मध्यकाल में ऐतिहासिक महापुरुषों, अमीरों, राजा-महाराजाओं द्वारा स्थापित किए गए लिंग को मनुष्य शिवलिंग कहा गया है।
 
🚩 स्वयंभू लिंग:- भगवान शिव किसी कारणवश स्वयं शिवलिंग के रूप में प्रकट होते हैं। इस तरह के शिवलिंग को स्वयंभू शिवलिंग कहते हैं। भारत में स्वयंभू शिवलिंग कई जगहों पर हैं। वरदान स्वरूप जहां शिव स्वयं प्रकट हुए थे।

भक्त लोग भगवान शिव के प्रतिक शिवलिंग को अपनी श्रद्धाअनुसार भिन्न भिन्न तरीके से बनाकर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। भगवान राम ने भी एक शिवलिंग रामेश्वरम में बनाया था। कहते हैं कि यह एक विशेष प्रकार की रेत का था जिसने बाद में ठोस रूप ले लिया था। 

(साभार  - डॉ0 विजय शंकर मिश्र)

Tuesday, 11 August 2020

जन्माष्टमी


आज का पर्व भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव है। उनका जन्म भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जन्माष्टमी पर्व हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। भगवान श्रीकृष्ण के भक्त इस पर्व को बड़ी धूमधाम के साथ मनाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। वे वसुदेव और देवकी की पुत्र थे। मथुरा के कारावास में उनका जन्म हुआ था और गोकुल में यशोदा और नन्द के यहां उनका लालन पालन हुआ था। 

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में हुआ था। हालांकि भगवान हर युग में जन्म लेते हैं। द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म क्यों हुआ था इस बात को स्वयं लीलाधर ने गीता के एक श्लोक में अपने अवतरित होने के कारण को बताया है। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में अर्जुन को यह बताया था कि जब जब धरती पर पाप बढ़ेगा। धर्म का नाश होगा। साधु-संतों का जीना मुश्किल हो जाएगा उस समय धर्म की पुनः स्थापना के लिए भगवान विष्णु अवतरित होंगे।

जन्माष्टमी पर लोग कान्हा जी के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं। कई लोग अपने घरों में बाल गोपाल को रखते हैं और उनकी सेवा एक छोटे बच्चे की भांति की जाती है। मान्यता है कि लड्डू गोपाल की सेवा से घर की सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं। लड्डू गोपाल के प्रसन्न होने से व्यक्ति का मन बहुत प्रसन्न रहता है। लड्डू गोपाल भाव के भूखे होते हैं।  

बाल गोपाल की पूजा की सावधानियां

सबसे पहले सुबह उठकर घर पर रखे बाल गोपाल को गंगा जल मिश्रित साफ पानी से स्नान करवाएं, दिन के हिसाब से रंग के कपड़े का चयन कर पहनाएं जैसे सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को नारंगी, शनिवार को नीला और रविवार को लाल कपड़ा, टोपी लगाएं, लड्डू गोपाल के श्रृंगार में उनके कान की बाली, कलाई में कड़ा, हाथों में बांसुरी और मोरपंख होना चाहिए। चंदन का टीका लगाएं। पूजा के बर्तन को जरूर साफ करें। लड्डू गोपाल को भोग में मक्खन, मिश्री और तुलसी के पत्ते प्रिय होते हैं। झूला झूलाएं और फिर झूले में लगे परदे को बंद करना ना भूले।  

जिन घरों में बाल गोपाल हैं वहां मांस-मदिरा का सेवन, गलत व्यवहार और अधार्मिक कार्यों से बचना चाहिए। रात को सोने से पहले बाल गोपाल को सुलाने के बाद ही सोएं। 

जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल के भोग

जन्माष्टमी के दिन आटे की पंजीरी बनाकर लड्डू गोपाल को भोग लगाएं। आटे की पंजीरी काफी स्वादिष्ट होती है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आटे की पंजीरी लड्डू गोपाल को काफी पसंद है।

लड्डू गोपाल को मक्खन बहुत पसंद है। उन्हें माखन चोर भी कहा जाता है। लड्डू गोपाल को जन्माष्टमी के दिन मक्खन मिश्री का भोग अवश्य लगाएं। 

जन्माष्टमी के पावन दिन लड्डू गोपाल को मखाना पाग का भोग लगाएं। लड्डू गोपाल को मखाना पाग मिठाई काफी पसंद है।

लड्डू गोपाल को जन्माष्टमी के दिन मखाने की खीर का भोग लगाएं। लड्डू गोपाल को दूध, घी, मक्खन और मेवे से बने पकवान काफी पसंद होते हैं। मखाने की खीर बनाने के लिए आपको काजू, बादाम, घी और मखानों की आवश्यकता पड़ेगी।

जन्माष्टमी के पावन दिन पंचामृत का बहुत अधिक महत्व होता है। जन्माष्टमी के दिन पंचामृत से लड्डू गोपाल का अभिषेक किया जाता है।  पंचामृत बनाने के लिए आपको घी, बतासे, दूध, दही, शहद, गंगाजल और तुलसी की आवश्यकता पड़ेगी। तुलसी पहले दिन तोड़ कर रख लें।

🙏 ‼ वृन्दावन बिहारीलाल की जय ‼ 🙏

(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Friday, 7 August 2020

उपनिषदों के पांच वचन

हिन्दुओं का धर्मग्रंथ है वेद। वेद के 4 भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। चारों के अंतिम भाग या तत्वज्ञान को वेदांत और उपनिषद कहते हैं। उपनिषदों की संख्या लगभग 1,000 बताई गई है। उसमें भी 108 महत्वपूर्ण हैं। ये उपनिषद छोटे-छोटे होते हैं। लगभग 5-6 पन्नों के। इन उपनिषदों का सार या निचोड़ है भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कही गई गीता। इतिहास ग्रंथ महाभारत को पंचम वेद माना गया है। वाल्मीकि रामायण और 18 पुराणों को भी इतिहास ग्रंथों की श्रेणी में रखा गया है।

।।प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।

अर्थ : जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा? उपनिषदों को जिसने भी पढ़ा और समझा, यह मानकर चलिए कि उसका जीवन बदल गया। उसकी सोच बदल गई। उपनिषदों से ऊपर कुछ भी नहीं। दुनिया का संपूर्ण दर्शन, विज्ञान और धर्म उपनिषदों में समाया हुआ है। आओ हम जानते हैं उपनिषदों के उन 5 वचनों को जिसे हर मनुष्य को याद रखना चाहिए।

पहला वचन : आहार शुद्धि से प्राणों के सत की शुद्धि होती है, सत्व शुद्धि से स्मृति निर्मल और स्थिरमति (जिसे प्रज्ञा कहते हैं) प्राप्त होती है। स्थिर बुद्धि से जन्म-जन्मांतर के बंधनों और ग्रंथियों का नाश होता है और बंधनों और ग्रंथियों से मुक्ति ही मोक्ष है। अत: आहार शुद्धि प्रथम नियम और प्रतिबद्धता है।

आहार केवल मात्र वही नहीं जो मुख से लिया जाए, आहार का अभिप्राय है स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर को पुष्ट और स्वस्थ रखने के लिए इस दुनिया से जो खाद्य लिया जाए।

1. कान के लिए आहार है शब्द या ध्वनि।

2. त्वचा के लिए आहार है स्पर्श।

3. नेत्रों के लिए आहार है दृश्य या रूप जगत।

4. नाक के लिए आहार है गंध या सुगंध।

5. जिह्वा के लिए आहार है अन्न और रस।

6. मन के लिए आहार है उत्तम विचार और ध्यान।

अत: ज्ञानेन्द्रियों के जो 5 दोष हैं जिससे चेतना में विकार पैदा होता है, उनसे बचें।


दूसरा वचन : प्रत्येक पूर्ण है। चाहे वह व्यक्ति हो, जगत हो, पत्थर, वृक्ष या अन्य कोई ब्रह्मांड हो, क्योंकि उस पूर्ण से ही सभी की उत्पत्ति हुई है। स्वयं की पूर्णता को प्राप्त करने के लिए ध्यान जरूरी है। जिस तरह एक बीज खिलकर वृक्ष बनकर हजारों बीजों में बदल जाता है, वैसी ही मनुष्य की भी गति है। यह संसार उल्टे वृक्ष के समान है। व्यक्ति के मस्तिष्क में उसकी पूर्णता की जड़ें हैं। ऐसा उपनिषदों में लिखा है।


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ -वृहदारण्यक उपनिषद

 

अर्थ : अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।


तीसरा वचन : जो व्यक्ति परस्पर सह-अस्तिव की भावना रखता है, मनुष्यों में वह श्रेष्ठ है। सभी के स्वास्थ्य और रक्षा की कामना करने वाला ही खुद के मन को निर्मल बनाकर श्रेष्ठ माहौल को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति निम्नलिखित भावना को आत्मसात करता है, उसका जीवन श्रेष्ठ बनता जाता है।


ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ -कठोपनिषद

 

अर्थ : परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। उक्त तरह की भावना रखने वाले का मन निर्मल रहता है। निर्मल मन से निर्मल भविष्य का उदय होता है।


।।शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।। -उपनिषद

 

अर्थ : शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है। अर्थात शरीर को सेहतमंद बनाए रखना जरूरी है। इसी के होने से सभी का होना है अत: शरीर की रक्षा और उसे निरोगी रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है। पहला सुख निरोगी काया।


।। येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:।

ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।। -उपनिषद


अर्थ : जिसके पास विद्या, तप, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं, वह मनुष्य ऐसा जीवन व्यतीत करते हैं जैसे एक मृग। अर्थात जिस मनुष्य ने किसी भी प्रकार से विद्या अध्ययन नहीं किया, न ही उसने व्रत और तप किया, थोड़ा बहुत अन्न-वस्त्र-धन या विद्या दान नहीं दिया, न उसमें किसी भी प्रकार का ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है, ऐसे मनुष्य इस धरती पर भार होते हैं। मनुष्य रूप में होते हुए भी पशु के समान जीवन व्यतीत करते हैं।


(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Monday, 27 July 2020

Kalpa (Sanskrit: कल्प kalpa)



Kalpa (Sanskrit: कल्प kalpa) is a Sanskrit word meaning a relatively long period of time (by human calculation) in Hindu and Buddhist cosmology.


Generally speaking, a kalpa is the period of time between the creation and recreation of a world or universe. The definition of a kalpa equaling 4.32 billion years in the Puranas—specifically Vishnu Purana and Bhagavata Purana.


The duration of the material universe is limited. It is manifested in cycles of kalpas. A kalpa is a day of Brahmā, and one day of Brahmā consists of a thousand cycles of four yugas, or ages: Satya Yuga, Treta Yuga, Dvapara Yuga and Kali Yuga. The cycle of Satya is characterized by virtue, wisdom and religion, there being practically no ignorance and vice, and the yuga lasts 1,728,000 years. In the Tretā-yuga vice is introduced, and this yuga lasts 1,296,000 years. In the Dvāpara-yuga there is an even greater decline in virtue and religion, vice increasing, and this yuga lasts 864,000 years. And finally in Kali-yuga (the yuga we have now been experiencing over the past 5,000 years) there is an abundance of strife, ignorance, irreligion and vice, true virtue being practically nonexistent, and this yuga lasts 432,000 years. 

 

In Kali-yuga vice increases to such a point that at the termination of the yuga the Supreme Lord Himself appears as the Kalki avatāra, vanquishes the demons, saves His devotees, and commences another Satya-yuga. Then the process is set rolling again. 

 

These four yugas, rotating a thousand times, comprise one day of Brahmā, and the same number comprise one night.. According to the Mahabharata, 12 months of Brahma (=360 days) constitute his year, and 100 such years are the life cycle of the universe. Brahmā lives one hundred of such "years" and then dies. 100 such years of "Brahma" is called a "Maha-Kalpa". These "hundred years" total 311 trillion 40 billion (311,040,000,000,000) earth years.  Fifty years of Brahma are supposed to have elapsed, and we are now in the fifty-first.

 

A Satya Yuga = 1,728,000 Earth  years

A Treta Yuga =  1,296,000 Earth years

A Dwapara Yuga = 864,000 Earth years

A Kali Yuga = 432,000 Earth years

A Mahayuga = Satya +Treta + Dwapara + Kali Yugas = 4,320,000 Earth Years

 

A Manvantara = 71 Yuga Cycles (Satya, Treta, Dwapara & Kali Yugas) with Sandhikala

A Sandhikala =  Equal to the length of a Satya-yuga (1,728,000) years

A Kalpa = 1,000 Chaturyuga = 4.32 Billion Earth Years

 

One day of Brahma = One Thousand Mahayuga = 14 Manvantaras + 15 Sandhikalas 

Two such Kalpa = Day and Night of Brahma

1 Day of Brahma = 2 Kalpa's = 4.32 X 2 Billion Earth Years = 8.64 Billion Earth Years

A month of Brahma = 30 days of Brahma (Day and Night) = 60 Kalpa

30 Days of Brahma = 30 X 8.64 Billion Earth Years = 259.2 Billion Earth  Years

1 Years of Brahma = 360 Brahma Days = 8.64 Billion Years X 360 = 3110.4 Billion Earth Years

A Mahakalpa = 100 Years of Brahma = 311, 000.4 Billion Earth Years

 

8000 such "Maha-Kalpa"-s form one "Yuga of Brahma", whose length is 2.4 Quintillion years. There are other greater cycles whose lengths are 22.3 Sextillion years, 670 Sextillion years and 201 Septillion years respectively.


By these calculations the life of Brahmā seems fantastic and interminable, but from the viewpoint of eternity it is as brief as a lightning flash. In the Causal Ocean there are innumerable Brahmās rising and disappearing like bubbles. Brahmā and his creation are all part of the material universe, and therefore they are in constant flux.


This much knowledge in 
Puranas, really beyond imagination.






Thursday, 23 July 2020

समय गणना तन्त्र


विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र*                               

■ क्रति = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुति = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुति = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग 
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )


सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l

Friday, 17 July 2020

देववाणी

अंग्रेजी में 'THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG' एक प्रसिद्ध वाक्य है।
कहा जाता है कि इसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए , जबकि यदि हम ध्यान से देखे तो आप पायेंगे कि , अंग्रेजी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उपलब्ध हैं, जबकि उपरोक्त वाक्य में 33 अक्षर प्रयोग किये गए हैं, जिसमे  चार बार O का प्रयोग A, E, U तथा R अक्षर के क्रमशः 2 बार प्रयोग दिख रहे हैं ।अपितु अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। 

आप किसी भी भाषा को उठा के देखिए, आपको कभी भी संस्कृत जितनी खूबसूरत और समृद्ध भाषा देखने को नहीं मिलेगी । संस्कृत वर्णमाला के सभी अक्षर एक श्लोक में व्यवस्थित क्रम में देखने को मिल जाएगा - 
 
 क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
 तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

अनुवाद -  पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सृजन कर्ता कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

संस्कृत भाषा वृहद और समृद्ध भाषा है, इसे ऐसे ही देववाणी नहीं कहा जाता है । आइये कुछ संस्कृत के श्लोकों को देखते हैं - 

क्या किसी भाषा मे सिर्फ #एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? जवाब है ,संस्कृत को छोड़कर अन्य किसी भाषा मे ऐसा करना असंभव है ।  उदाहरण - 

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

अनुवाद : हे नाना मुख वाले (नानानन)! वह निश्चित ही (ननु) मनुष्य नहीं है, जो अपने से कमजोर से भी पराजित हो जाऐ। और वह भी मनुष्य नहीं है (ना-अना) जो अपने से कमजोर को मारे (नुन्नोनो)। जिसका नेता पराजित न हुआ हो ,वह हार जाने के बाद भी अपराजित है (नुन्नोऽनुन्नो)। जो पूर्णतः पराजित को भी मार देता है (नुन्ननुन्ननुत्), वह पापरहित नहीं है (नानेना)।

उपरोक्त एक प्रचलित उदाहरण है ।चलिए अन्य को देखते हैं - 

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः

अनुवाद : दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

एक अन्य देखिए - 

कः कौ के केककेकाकः काककाकाककः ककः।
काकः काकः ककः काकः कुकाकः काककः कुकः ॥
काककाक ककाकाक कुकाकाक ककाक क।
कुककाकाक काकाक कौकाकाक कुकाकक ॥

अनुवाद - परब्रह्म (कः) [श्री राम] पृथ्वी (कौ) और साकेतलोक (के) में [दोनों स्थानों पर] सुशोभित हो रहे हैं। उनसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आनन्द निःसृत होता है। वह मयूर की केकी (केककेकाकः) एवं काक (काकभुशुण्डि) की काँव-काँव (काककाकाककः) में आनन्द और हर्ष की अनुभूति करते हैं। उनसे समस्त लोकों (ककः) के लिए सुख का प्रादुर्भाव होता है। उनके लिए [वनवास के] दुःख भी सुख (काकः) हैं। उनका काक (काकः) [काकभुशुण्डि] प्रशंसनीय है। उनसे ब्रह्मा (ककः) को भी परमानन्द की प्राप्ति होती है। वह [अपने भक्तों को] पुकारते (काकः) हैं। उनसे कूका अथवा सीता (कुकाकः) को भी आमोद प्राप्त होता है। वह अपने काक [काकभुशुण्डि] को पुकारते (काककः) हैं , और उनसे सांसारिक फलों एवं मुक्ति का आनन्द (कुकः) प्रकट होता है। हे मेरे एकमात्र प्रभु ! आप जिनसे [जयंत] काक के (काककाक) शीश पर दुःख [रूपी दण्ड प्रदान किया गया] था; आप जिनसे समस्त प्राणियों (कका) में आनन्द निर्झरित होता है; कृपया पधारें, कृपया पधारें (आक आक)। हे एकमात्र प्रभु! जिनसे सीता (कुकाक) प्रमुदित हैं; कृपया पधारें (आक)। हे मेरे एकमात्र स्वामी! जिनसे ब्रह्माण्ड (कक) के लिए सुख है; कृपया आ जाइए (आक)। हे भगवन (क)! हे एकमात्र प्रभु ! जो नश्वर संसार (कुकक) में आनन्द खोज रहे व्यक्तियों को स्वयं अपनी ओर आने का आमंत्रण देते हैं; कृपया आ जाएँ, कृपया पधारें (आक आक)। हे मेरे एकमात्र नाथ ! जिनसे ब्रह्मा एवं विष्णु (काक) दोनों को आनन्द है; कृपया आ जाइए (आक)। हे एक ! जिनसे ही भूलोक (कौक) पर सुख है; कृपया पधारें, कृपया पधारें (आक आक)। हे एकमात्र प्रभु ! जो (रक्षा हेतु) दुष्ट काक द्वारा पुकारे जाते हैं (कुकाकक) ।

लोलालालीललालोल लीलालालाललालल।
लेलेलेल ललालील लाल लोलील लालल ॥

अनुवाद - हे एकमात्र प्रभु! जो अपने घुँघराले केशों की लटों की एक पंक्ति के साथ (लोलालालीलल) क्रीड़ारत हैं; जो कदापि परिवर्तित नहीं होते (अलोल); जिनका मुख [बाल] लीलाओं में श्लेष्मा से परिपूर्ण है (लीलालालाललालल); जो [शिव धनुर्भंग] क्रीड़ा में पृथ्वी की सम्पत्ति [सीता] को स्वीकार करते हैं (लेलेलेल); जो मर्त्यजनों की विविध सांसारिक कामनाओं का नाश करते हैं (ललालील), हे बालक [रूप राम] (लाल)! जो प्राणियों के चंचल प्रकृति वाले स्वभाव को विनष्ट करते हैं (लोलील); [ऐसे आप सदैव मेरे मानस में] आनन्द करें (लालल)। 

 क्या किसी भाषा मे सिर्फ #दो अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? जवाब है संस्कृत को छोड़कर अन्य किसी भाषा में ऐसा करना असंभव है । उदाहरण -

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे
भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा: ।

अनुवाद -  निर्भय हाथी ;जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है ,अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की टेरेह है और जो काले बादलों सा है ,वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

अन्य उदाहरण -

क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर ।
कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक ॥

अनुवाद - क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत ,रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला , रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी (था) ।

पुनः.....क्या किसी भाषा मे सिर्फ # तीन अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? जवाब है संस्कृत को छोड़कर अन्य किसी भाषा मे ऐसा करना असंभव है - 

उदाहरण -

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां
दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः ।।

वह परमात्मा ( विष्णु) जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है ,जिस तरह के नाद से उसने दानव (हिरण्यकशिपु ) को मारा था।

#विशेष - निम्न छंद में पहला चरण ही चारों चरणों में चार बार आवृत्त हुआ है ,लेकिन अर्थ अलग-अलग हैं, जो यमक अलंकार का लक्षण है। इसीलिए ये महायमक संज्ञा का एक विशिष्ट उदाहरण है - 

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जतीशमार्गणा:।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा:॥

अनुवाद - पृथ्वीपति अर्जुन के बाण विस्तार को प्राप्त होने लगे ,जब कि शिव जी के बाण भंग होने लगे। राक्षसों के हंता प्रथम गण विस्मित होने लगे तथा शिव का ध्यान करने वाले देवता एवं ऋषिगण (इसे देखने के लिए) पक्षियों के मार्गवाले आकाश-मंडल में एकत्र होने लगे।

एक अन्य विशिष्ट शब्द संयोजन - 

जजौजोजाजिजिज्जाजी तं ततोऽतितताततुत् ।
भाभोऽभीभाभिभूभाभू- रारारिररिरीररः ॥

अनुवाद - महान योद्धा कई युद्धों के विजेता,शुक्र और बृहस्पति के समान तेजस्वी, शत्रुओं के नाशक बलराम, रणक्षेत्र की ओर ऐसे चले ,मानो चतुरंगिणी सेना से युक्त शत्रुओं की गति को अवरुद्ध करता हुआ शेर चला आ रहा हो।

(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Thursday, 18 June 2020

Ten Things a Hindu should do .......

Ten Things a Hindu should do While using English Language. 

# 01. Please stop using the term "God fearing" - Hindus never ever fear God. For us, God is everywhere and we are also part of God. God is not a separate entity to fear. It is integral.

# 02. Request avoid term "RIP" when someone dies. Use "Om Shanti", "Sadhgati" or "I wish this atma attains moksha/sadhgati /Uthama lokas".  Hinduism neither has the concept of "soul" nor its "resting". The terms "Atma" and "Jeeva" are, in a way, antonyms for the word "soul".(to be understood in detail)

# 03. Please don't use the word "Mythology" for our historic epics (Ithihaas) Ramayana and Mahabharata.  Rama and Krishna are historical heroes, not just mythical characters.

# 04. Please don't be apologetic about idol worship and say “Oh, that's just symbolic". All religions have idolatry in kinds or forms - cross, words, letters (calligraphy) or direction. 

Also let's stop using the words the words 'idols', 'statues' or 'images' when we refer to the sculptures of our Gods. 

Use the terms 'Moorthi' or 'Vigraha'. If words like Karma, Yoga, Guru and Mantra can be in the mainstream, why not Moorthi or Vigraha? 

# 04. Please don't refer to Ganesh and Hanuman as "Elephant god" and "Monkey god" respectively. You can simply write Shree Ganesh and Shree Hanuman. 

# 05. Please don't refer to our temples as prayer halls. Temples are "devalaya" (abode of god) and not "prarthanalaya" (Prayer halls).

# 06. Please don't wish your children "black birthday" by allowing  them to blow off the candles that are kept on top of the birthday cake. Don't throw spit on the divine fire (Agni Deva). Instead, ask them to pray: "Oh divine fire, lead me from darkness to light" (Thamasoma Jyotirgamaya) by lighting a lamp. These are all strong images that go deep into the psyche.

# 07. Please avoid using the words "spirituality" and "materialistic". For a Hindu, everything is divine. The words spirituality and materialism came to India through evangelists and Europeans who had a concept of Church vs State. Or Science vs Religion. On the contrary, in India, Sages were scientists and the foundation stone of Sanatan Dharma was Science.

# 09. Please don't use the word "Sin" instead of "Paapa". We only have Dharma (duty, righteousness, responsibility and privilege) and Adharma (when dharma is not followed).  Dharma has nothing to do with social or religious morality. 'Paapa' derives from Adharma. 

# 10. Please don't use loose translation like meditation for "dhyana" and 'breathing exercise' for "Pranayama". It conveys wrong meanings. Use the original words. 

Remember,  the world respects only those who respect themselves!


(Courtesy - Francois Gautier, Facebook page)